
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) की कैंसर रिसर्च एजेंसी, इंटरनेशनल एजेंसी फॉर रिसर्च ऑन कैंसर (IARC), ने तीन व्यापक रूप से इस्तेमाल होने वाली दवाओं—हाइड्रोक्लोरोथियाजाइड, वोरिकोनाजोल और टैक्रोलिमस—को इंसानों के लिए कैंसरकारी ग्रुप-1 श्रेणी में रखा है। ये दवाएं क्रमशः हाई ब्लड प्रेशर, गंभीर फंगल इंफेक्शन और अंग प्रत्यारोपण के बाद शरीर द्वारा नए अंग को रिजेक्ट करने से रोकने के लिए इस्तेमाल की जाती हैं।IARC के इस वर्गीकरण का अर्थ यह नहीं है कि इन दवाओं का सेवन करने वाले हर व्यक्ति को कैंसर होगा। इसका मतलब है कि उपलब्ध वैज्ञानिक प्रमाणों के आधार पर इन दवाओं और कैंसर के बीच संबंध को लेकर पर्याप्त चिंता और प्रमाण मौजूद हैं। विशेषज्ञों ने मरीजों से अपील की है कि वे बिना डॉक्टर की सलाह के अपनी दवा बंद न करें, क्योंकि कई मामलों में इन दवाओं को बंद करना गंभीर स्वास्थ्य जोखिम पैदा कर सकता है।
हाइड्रोक्लोरोथियाजाइड से त्वचा कैंसर का खतरा
हाइड्रोक्लोरोथियाजाइड का इस्तेमाल हाई ब्लड प्रेशर के इलाज में लंबे समय से किया जाता रहा है। IARC के अनुसार, इसके इस्तेमाल और स्क्वैमस सेल कार्सिनोमा तथा होंठ के कैंसर के बीच संबंध के पर्याप्त प्रमाण मिले हैं।अमेरिका और डेनमार्क में हुए अध्ययनों में लंबे समय तक हाइड्रोक्लोरोथियाजाइड लेने वाले लोगों में त्वचा कैंसर की दर अधिक पाई गई। विशेषज्ञों के अनुसार, इसका एक संभावित कारण दवा का फोटो-टॉक्सिक प्रभाव है, जिसमें त्वचा सूर्य की अल्ट्रावायलेट (UV) किरणों के प्रति अधिक संवेदनशील हो सकती है।
वोरिकोनाजोल और त्वचा कैंसर
वोरिकोनाजोल एक एंटीफंगल दवा है, जिसका इस्तेमाल विशेष रूप से कमजोर प्रतिरक्षा प्रणाली वाले मरीजों में गंभीर फंगल संक्रमण के इलाज के लिए किया जाता है। लंबे समय तक इलाज लेने वाले कुछ ट्रांसप्लांट मरीजों में इसके इस्तेमाल और स्क्वैमस सेल स्किन कैंसर के बीच संबंध पाया गया है।वैज्ञानिकों के अनुसार, वोरिकोनाजोल से जुड़ा फोटो-टॉक्सिक प्रभाव त्वचा को सूर्य की UV किरणों के प्रति अधिक संवेदनशील बना सकता है और लंबे समय तक इस्तेमाल की स्थिति में त्वचा कैंसर के जोखिम में योगदान कर सकता है।
टैक्रोलिमस और कमजोर प्रतिरक्षा प्रणाली
टैक्रोलिमस का इस्तेमाल अंग प्रत्यारोपण के बाद शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली को दबाने के लिए किया जाता है, ताकि शरीर नए अंग को रिजेक्ट न करे। इसके इस्तेमाल को नॉन-हॉजकिन लिंफोमा और पोस्ट-ट्रांसप्लांट लिम्फोप्रोलिफेरेटिव डिसऑर्डर (PTLD) से जोड़ा गया है।संभावित कारण प्रतिरक्षा प्रणाली का लंबे समय तक दबा रहना है। इससे शरीर की असामान्य कोशिकाओं को पहचानने और नष्ट करने की प्राकृतिक क्षमता प्रभावित हो सकती है। हालांकि, ल्यूकेमिया और स्किन कार्सिनोमा के संबंध में उपलब्ध प्रमाण सीमित बताए गए हैं।
भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह चेतावनी?
भारत में इन तीनों दवाओं का इस्तेमाल अलग-अलग गंभीर स्वास्थ्य स्थितियों में किया जाता है। हाइड्रोक्लोरोथियाजाइड ब्लड प्रेशर के इलाज में, वोरिकोनाजोल गंभीर फंगल संक्रमण में और टैक्रोलिमस ट्रांसप्लांट के बाद मरीजों की देखभाल में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।विशेषज्ञों का मानना है कि इस वर्गीकरण को गंभीरता से लिया जाना चाहिए, लेकिन इसे लेकर अनावश्यक डर भी नहीं फैलना चाहिए। दवा का जोखिम मरीज की बीमारी, खुराक, उपचार की अवधि और अन्य स्वास्थ्य कारकों पर निर्भर कर सकता है।इसलिए मरीजों को अपनी दवाएं खुद से बंद करने के बजाय अपने डॉक्टर से चर्चा करनी चाहिए। डॉक्टर जरूरत के अनुसार उपचार की समीक्षा कर सकते हैं और मरीज को जोखिम तथा लाभ के बारे में उचित सलाह दे सकते हैं।
निष्कर्ष: IARC का ग्रुप-1 वर्गीकरण कैंसर के जोखिम से जुड़े वैज्ञानिक प्रमाणों की गंभीर चेतावनी है, लेकिन यह किसी व्यक्ति के लिए कैंसर होने की निश्चित भविष्यवाणी नहीं है। मरीजों के लिए सबसे जरूरी है कि वे डॉक्टर की सलाह के बिना इलाज बंद न करें और लंबे समय तक दवा लेने की स्थिति में नियमित चिकित्सकीय निगरानी बनाए रखें।