
प्रधानमंत्री Narendra Modi के इजरायल के दो दिवसीय दौरे ने वैश्विक कूटनीतिक हलकों में व्यापक चर्चा को जन्म दिया है। इस यात्रा के दौरान भारत और इजरायल के बीच रणनीतिक साझेदारी को और मजबूत करने पर विशेष जोर दिया गया। रक्षा, साइबर सुरक्षा, उन्नत हथियार प्रणालियों, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और उभरती प्रौद्योगिकियों के क्षेत्र में कई महत्वपूर्ण समझौतों पर सहमति बनी। विश्लेषकों का मानना है कि यह बढ़ता सहयोग दक्षिण एशिया की सामरिक राजनीति पर भी प्रभाव डाल सकता है, विशेष रूप से पाकिस्तान की सुरक्षा चिंताओं को लेकर।इजरायल के प्रधानमंत्री Benjamin Netanyahu ने हाल ही में भारत सहित कुछ देशों के साथ एक प्रस्तावित “हेक्सागन एलायंस” की अवधारणा रखी है। इसके साथ ही उन्होंने “आयरन एलायंस” का विचार भी सामने रखा, जिसका उद्देश्य इस्लामिक कट्टरता और आतंकवाद के खिलाफ समन्वित रणनीति विकसित करना बताया गया है। यद्यपि यह पहल प्रारंभिक स्तर पर है, लेकिन क्षेत्रीय समीकरणों को देखते हुए इसे तुर्की और पाकिस्तान जैसे देश सतर्कता के साथ देख सकते हैं।भारत और इजरायल के संबंधों में विशेष तेजी 2017 में प्रधानमंत्री मोदी की तेल अवीव यात्रा के बाद आई। तब से दोनों देशों ने रक्षा सहयोग को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया है। वर्तमान में भारत, इजरायल का सबसे बड़ा रक्षा उपकरण ग्राहक माना जाता है। मिसाइल रक्षा प्रणाली, ड्रोन तकनीक, निगरानी उपकरण और सटीक हथियार प्रणालियों के क्षेत्र में दोनों देशों का सहयोग लगातार बढ़ा है।नए वर्गीकृत ढांचे के अंतर्गत भारत को इजरायल से कुछ उन्नत सैन्य तकनीक मिलने की संभावना जताई जा रही है। इनमें “आयरन बीम” नामक 100 किलोवाट क्षमता वाला हाई-एनर्जी लेजर हथियार प्रणाली शामिल है, जिसे इजरायली सेना में दिसंबर 2025 से शामिल किए जाने की योजना है। इसके अलावा आयरन डोम मिसाइल डिफेंस सिस्टम के टेक्नोलॉजी ट्रांसफर पर भी चर्चा की संभावना बताई जा रही है। यदि यह सहयोग आगे बढ़ता है, तो भारत की वायु रक्षा क्षमता में उल्लेखनीय वृद्धि हो सकती है।पाकिस्तानी विश्लेषकों और पूर्व राजनयिकों ने इस बढ़ते भारत-इजरायल सहयोग पर चिंता व्यक्त की है। अमेरिका में पाकिस्तान के पूर्व राजदूत मसूद खान के अनुसार, भारत-इजरायल के बीच रणनीतिक समझौता विशेष महत्व रखता है और इसे क्षेत्रीय संतुलन के संदर्भ में देखा जाना चाहिए। उनका मानना है कि यह समझौता मध्य पूर्व और दक्षिण एशिया में नए सामरिक समीकरणों को जन्म दे सकता है।चीन में पाकिस्तान के पूर्व राजदूत मसूद खालिद ने भी रक्षा और तकनीकी सहयोग के विस्तार को पाकिस्तान की सुरक्षा नीति के लिए चुनौतीपूर्ण बताया है। उनका कहना है कि ड्रोन, साइबर सुरक्षा और कृत्रिम बुद्धिमत्ता के क्षेत्र में बढ़ता तालमेल भविष्य के संघर्षों की प्रकृति को बदल सकता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह साझेदारी केवल रक्षा सौदों तक सीमित नहीं है, बल्कि खुफिया जानकारी साझा करने, आतंकवाद विरोधी रणनीतियों और उभरती प्रौद्योगिकियों में संयुक्त अनुसंधान तक विस्तारित है। भारत और इजरायल दोनों ही आतंकवाद के खिलाफ सख्त रुख रखते हैं और इसी साझा दृष्टिकोण ने संबंधों को और प्रगाढ़ किया है।हालांकि, क्षेत्रीय स्थिरता की दृष्टि से यह आवश्यक होगा कि सभी पक्ष संतुलन और संवाद बनाए रखें। दक्षिण एशिया पहले से ही संवेदनशील सामरिक वातावरण का सामना कर रहा है, जहां परमाणु क्षमता, सीमा विवाद और भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा मौजूद हैं। ऐसे में किसी भी नए रक्षा गठजोड़ का प्रभाव व्यापक और दीर्घकालिक हो सकता है।प्रधानमंत्री मोदी का यह दौरा भारत-इजरायल संबंधों को नई दिशा देने वाला माना जा रहा है। आने वाले समय में यह स्पष्ट होगा कि यह रणनीतिक निकटता क्षेत्रीय सुरक्षा ढांचे और वैश्विक राजनीति में किस प्रकार का परिवर्तन लाती है।