
दिल्ली के लाल किले के पास पिछले वर्ष हुए बम धमाके (Delhi Blast) की जांच में सुरक्षा एजेंसियों को सनसनीखेज खुलासे हाथ लगे हैं। जांच के दौरान एक अत्यंत संगठित और तकनीकी रूप से प्रशिक्षित ‘व्हाइट-कॉलर टेरर मॉड्यूल’ का पर्दाफाश हुआ है, जिसमें पेशे से डॉक्टर और अन्य शिक्षित आरोपी शामिल थे। यह मॉड्यूल पाकिस्तान में बैठे अपने आकाओं के संपर्क में रहकर देश की सुरक्षा को नुकसान पहुंचाने की साजिश रच रहा था।जांच में सामने आया है कि गिरफ्तार आरोपी डॉक्टर मुजम्मिल गनाई और अदील राथर ने सुरक्षा एजेंसियों से बचने के लिए अत्यंत शातिर और तकनीकी तरीकों को अपनाया था। आरोपियों ने तथाकथित ‘डुअल-फोन प्रोटोकॉल’ के तहत काम किया। प्रत्येक आरोपी के पास दो से तीन मोबाइल हैंडसेट मौजूद थे। एक मोबाइल उनके असली नाम और पहचान पर पंजीकृत था, जिसका उपयोग वे अपने सामान्य सामाजिक और पेशेवर जीवन में करते थे। वहीं दूसरा मोबाइल ‘टेरर फोन’ के रूप में इस्तेमाल किया जाता था, जिसमें फर्जी आधार कार्ड के जरिए जारी किए गए सिम कार्ड लगे होते थे।इन आतंकियों द्वारा पाकिस्तान स्थित हैंडलरों से बातचीत के लिए ‘उकासा’, ‘फैजान’ और ‘हाशमी’ जैसे कोडनेम का उपयोग किया जाता था। जांच एजेंसियों के अनुसार, आरोपी व्हाट्सऐप और टेलीग्राम जैसे एन्क्रिप्टेड मैसेजिंग ऐप्स के माध्यम से निर्देश प्राप्त करते थे। इन ऐप्स की एक तकनीकी खामी का फायदा उठाते हुए आरोपी सिम कार्ड निष्क्रिय होने के बाद भी इनका उपयोग करते रहे। इसी माध्यम से उन्हें यूट्यूब के जरिए आईईडी (इम्प्रोवाइज्ड एक्सप्लोसिव डिवाइस) बनाने की ट्रेनिंग दी जा रही थी।जांच में यह भी सामने आया है कि आतंकवादी मॉड्यूल लगातार अपने डिजिटल फुटप्रिंट मिटाने के लिए मोबाइल फोन बदलते रहते थे। सिम कार्ड अल्प अवधि के लिए सक्रिय किए जाते थे और फिर उन्हें निष्क्रिय कर दिया जाता था, जिससे ट्रैकिंग कठिन हो सके। यह तरीका लंबे समय से आतंकी नेटवर्क द्वारा इस्तेमाल किया जा रहा था, जिसे अब सुरक्षा एजेंसियों ने चिन्हित कर लिया है।
इस गंभीर सुरक्षा चुनौती को देखते हुए केंद्र सरकार के दूरसंचार विभाग (DoT) ने बड़ा निर्णय लिया है। अब सभी मैसेजिंग ऐप्स जैसे व्हाट्सऐप, टेलीग्राम और अन्य एन्क्रिप्टेड प्लेटफॉर्म को डिवाइस में मौजूद सक्रिय फिजिकल सिम कार्ड से जोड़ना अनिवार्य होगा। दूरसंचार विभाग ने सभी टेलीकॉम और टेक्नोलॉजी कंपनियों को 90 दिनों का अल्टीमेटम जारी किया है, जिसके भीतर उन्हें यह सुनिश्चित करना होगा कि उनके ऐप केवल सक्रिय सिम वाले डिवाइस पर ही कार्य करें।सरकार ने स्पष्ट किया है कि यदि कोई कंपनी या उपयोगकर्ता इन नए नियमों का पालन नहीं करता है, तो उसके खिलाफ भारी जुर्माना और कड़ी कानूनी कार्रवाई की जाएगी। यह कदम आतंकियों द्वारा तकनीक के दुरुपयोग को रोकने और राष्ट्रीय सुरक्षा को मजबूत करने की दिशा में अहम माना जा रहा है।इस मामले में जम्मू-कश्मीर पुलिस ने फर्जी आधार कार्ड के जरिए सिम कार्ड जारी करने वाले एक बड़े रैकेट का भी भंडाफोड़ किया है। जांच में पता चला है कि यह रैकेट आतंकी संगठनों को बड़ी संख्या में फर्जी सिम उपलब्ध कराता था। इसी मॉड्यूल का एक सदस्य उमर-उन-नबी विस्फोटक से भरी गाड़ी चलाते समय मारा गया था, जिससे इस साजिश की गंभीरता और भयावहता का अंदाजा लगाया जा सकता है।सुरक्षा एजेंसियों का मानना है कि यह मामला दर्शाता है कि आधुनिक आतंकवाद अब केवल हथियारों तक सीमित नहीं है, बल्कि तकनीक, शिक्षा और डिजिटल प्लेटफॉर्म का भी खतरनाक तरीके से इस्तेमाल किया जा रहा है। जांच एजेंसियां इस पूरे नेटवर्क की गहराई से पड़ताल कर रही हैं और भविष्य में ऐसी साजिशों को नाकाम करने के लिए कड़े कदम उठाए जा रहे हैं।