
राज्य शासन के संज्ञान में यह आया है कि कतिपय शरारती तत्वों द्वारा सोशल मीडिया पर कुछ टिप्पणियाँ एवं सामग्री इस प्रकार वायरल की जा रही है मानो वह माननीय उच्चतम न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत मध्यप्रदेश शासन के हलफनामे का हिस्सा हों।शासन द्वारा इस विषय की गंभीरता से जाँच कराई गई। अभिलेखों के प्रारंभिक परीक्षण से यह स्पष्ट हुआ है कि सोशल मीडिया पर प्रसारित टिप्पणियाँ एवं कथन पूर्णतः असत्य, मिथ्या एवं भ्रामक हैं, जो केवल दुष्प्रचार की भावना से प्रसारित किए जा रहे हैं।यह स्पष्ट किया जाता है कि वायरल की जा रही सामग्री न तो मध्यप्रदेश शासन के हलफनामे का भाग है और न ही यह राज्य की किसी स्वीकृत नीति अथवा निर्णय से संबंधित है।वास्तव में, यह सामग्री मध्यप्रदेश राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग (महाजन आयोग) के अंतिम प्रतिवेदन (भाग-1) का हिस्सा है। यह आयोग 17 नवम्बर 1980 को गठित हुआ था और दिनांक 22 दिसम्बर 1983 को अपनी अंतिम रिपोर्ट तत्कालीन राज्य शासन को प्रस्तुत की थी। राज्य शासन ने माननीय उच्चतम न्यायालय में ओबीसी आरक्षण संबंधी प्रकरण में महाजन आयोग की रिपोर्ट सहित 1994 से 2011 तक के वार्षिक प्रतिवेदन एवं वर्ष 2022 के राज्य पिछड़ा वर्ग कल्याण आयोग के प्रतिवेदन भी प्रस्तुत किए हैं।
यह उल्लेखनीय है कि महाजन आयोग की रिपोर्ट माननीय उच्च न्यायालय में भी अभिलेख का हिस्सा रही है और इस प्रकार यह स्वतः ही माननीय उच्चतम न्यायालय के अभिलेखों में भी सम्मिलित है।शासन पुनः स्पष्ट करता है कि वायरल की जा रही सामग्री शासन के हलफनामे का हिस्सा नहीं है। साथ ही यह भी उल्लेखनीय है कि महाजन आयोग की रिपोर्ट में 35% आरक्षण की अनुशंसा की गई थी, जबकि राज्य शासन ने 27% आरक्षण लागू किया है। इससे स्पष्ट होता है कि शासन का निर्णय महाजन रिपोर्ट पर आधारित नहीं है।भारत में आरक्षण को लेकर समय-समय पर गठित विभिन्न विशेषज्ञ समितियों की रिपोर्टें एवं वार्षिक प्रतिवेदन शासकीय अभिलेखों का हिस्सा रहे हैं और न्यायालयों के समक्ष प्रस्तुत किए जाते रहे हैं।सोशल मीडिया पर इन प्रतिवेदनों के किसी हिस्से को संदर्भ से हटाकर प्रस्तुत करना और उसे शासन के हलफनामे का हिस्सा बताना एक निंदनीय एवं असत्य प्रयास है। राज्य शासन इस मामले की गंभीरता से जाँच कर आवश्यक कार्रवाई करेगा।