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राफेल कार्यक्रम में तकनीकी साझेदारी को लेकर भारत-फ्रांस के बीच चुनौती,

फ्रांस राफेल लड़ाकू विमान कार्यक्रम के लिए अंतरराष्ट्रीय साझेदारों की भागीदारी चाहता है, लेकिन रिपोर्ट्स के अनुसार वह राफेल की कुछ महत्वपूर्ण तकनीकों और सिस्टम के सोर्स कोड तक पूर्ण पहुंच साझा करने को लेकर अब भी सतर्क है। यह स्थिति भारत की दीर्घकालिक औद्योगिक आत्मनिर्भरता और परिचालन स्वतंत्रता के दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण मानी जा रही है।भारत फ्रांस से 114 राफेल लड़ाकू विमानों की संभावित खरीद पर बातचीत कर रहा है। रिपोर्ट्स में दावा किया गया है कि फ्रांस RBE2 AESA रडार, MDPU मिशन कंप्यूटर और SPECTRA इलेक्ट्रॉनिक-वॉरफेयर सिस्टम के सोर्स कोड तक भारत को पहुंच देने के लिए तैयार नहीं है। ये प्रणालियां विमान की सेंसर फ्यूजन क्षमता, खतरे की पहचान, मिशन प्रबंधन और इलेक्ट्रॉनिक युद्ध क्षमताओं में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।भारत की प्राथमिकता केवल आधुनिक लड़ाकू विमान हासिल करना नहीं, बल्कि अगले कई दशकों के लिए औद्योगिक और तकनीकी स्वायत्तता विकसित करना है। ऐसे में महत्वपूर्ण डिजिटल प्रणालियों पर सीमित तकनीकी पहुंच भविष्य में विमान के स्वदेशी अपग्रेड, रखरखाव और आवश्यकता के अनुसार संशोधन की क्षमता को प्रभावित कर सकती है।दूसरी ओर, रूस की ओर से Su-57E के संदर्भ में सोर्स कोड और डिजाइन डॉक्यूमेंटेशन तक पहुंच की पेशकश किए जाने की रिपोर्ट्स ने भारत के लिए बातचीत के विकल्पों को व्यापक बनाया है। इससे फ्रांस के साथ वार्ता में भारत अपनी तकनीकी और औद्योगिक आवश्यकताओं को अधिक मजबूती से रखने की स्थिति में आ सकता है।फ्रांस के लिए अपनी बौद्धिक संपदा और संवेदनशील सैन्य तकनीक की सुरक्षा करना स्वाभाविक है। हालांकि, भारत के लिए किसी भी बड़े रक्षा सौदे का मूल्यांकन केवल विमान की क्षमता के आधार पर नहीं, बल्कि टेक्नोलॉजी ट्रांसफर, स्थानीय उत्पादन, रखरखाव, अपग्रेड और दीर्घकालिक औद्योगिक आत्मनिर्भरता के आधार पर भी किया जाएगा।राफेल के भविष्य के F5 संस्करण के विकास में अंतरराष्ट्रीय साझेदारी और संभावित औद्योगिक सहयोग महत्वपूर्ण हो सकते हैं। ऐसे में यदि तकनीकी साझेदारी की शर्तों पर पर्याप्त सहमति नहीं बनती है, तो इससे भविष्य के सहयोग और संभावित 114 विमानों के सौदे पर भी असर पड़ने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।

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