भोपाल के बड़ा तालाब (वेटलैंड) क्षेत्र में अतिक्रमण और पर्यावरणीय नियमों के उल्लंघन से जुड़े मामले में राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) ने संबंधित अधिकारियों की कार्यप्रणाली पर गंभीर चिंता व्यक्त की है। न्यायाधिकरण ने कहा कि लंबे समय से मामला लंबित रहने के बावजूद प्रभावी कार्रवाई का अभाव कानून के शासन के प्रति उदासीनता को दर्शाता है।राशिद नूर खान बनाम कलेक्टर भोपाल एवं अन्य प्रकरण की सुनवाई के दौरान एनजीटी ने उल्लेख किया कि वर्ष 2020 से मामला न्यायाधिकरण के समक्ष विचाराधीन है, लेकिन अब तक वेटलैंड क्षेत्र का समुचित सीमांकन और मापन पूरा नहीं किया जा सका है। न्यायाधिकरण ने कहा कि सीमांकन में देरी से यह आशंका उत्पन्न होती है कि प्रतिबंधित क्षेत्र में बने कुछ अवैध निर्माणों को संरक्षण मिल रहा हो सकता है। इस विषय पर संबंधित अधिकारियों से जवाब भी तलब किया गया है।सुनवाई के दौरान आवेदक पक्ष की ओर से प्रस्तुत जानकारी में कहा गया कि कुछ छोटे अतिक्रमणों को हटाया गया है, लेकिन बड़े और प्रभावशाली अतिक्रमणों पर अपेक्षित कार्रवाई नहीं हुई है। इस पर भोपाल नगर निगम ने स्वीकार किया कि वेटलैंड, निजी तथा शासकीय भूमि पर अतिक्रमण मौजूद हैं तथा कुछ मामलों में उच्च न्यायालय के अंतरिम आदेश प्रभावी हैं।एनजीटी ने स्पष्ट किया कि उच्च न्यायालय के आदेशों का सम्मान आवश्यक है, लेकिन उनके आधार पर अवैध निर्माणों को अनिश्चितकाल तक जारी नहीं रहने दिया जा सकता। न्यायाधिकरण ने कहा कि नगर निगम का दायित्व है कि प्रत्येक निर्माण का परीक्षण करे और यह सुनिश्चित करे कि वह वेटलैंड नियम, 2017 के प्रतिबंधित क्षेत्र में तो नहीं आता।राष्ट्रीय हरित अधिकरण ने भोपाल नगर निगम और जिला प्रशासन को निर्देश दिए हैं कि फुल टैंक लेवल (एफटीएल) तथा बफर जोन में स्थित सभी अतिक्रमणों की पहचान कर कानून के अनुसार आवश्यक कार्रवाई की जाए। साथ ही अगली सुनवाई से पहले की गई कार्रवाई की विस्तृत प्रगति रिपोर्ट न्यायाधिकरण के समक्ष प्रस्तुत करने के निर्देश भी दिए गए हैं।यह मामला भोपाल के पर्यावरणीय रूप से संवेदनशील बड़ा तालाब क्षेत्र के संरक्षण, वेटलैंड नियमों के प्रभावी पालन और शहरी विकास के बीच संतुलन बनाए रखने की आवश्यकता को रेखांकित करता है।