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सिंधु जल संधि के 66 साल: तनाव के बीच पानी बना भारत-पाकिस्तान संबंधों का अहम मुद्दा,

भारत और पाकिस्तान के बीच लंबे समय से चले आ रहे तनाव के बीच आज सिंधु जल संधि को 66 साल पूरे हो गए। 19 सितंबर 1960 को कराची में भारत और पाकिस्तान के बीच इस ऐतिहासिक संधि पर हस्ताक्षर हुए थे। दोनों देशों के बीच कई युद्ध और गंभीर राजनीतिक मतभेद होने के बावजूद लंबे समय तक यह संधि दोनों देशों के बीच जल सहयोग का महत्वपूर्ण आधार बनी रही।हालांकि, अप्रैल 2025 में पहलगाम आतंकी हमले के बाद भारत ने सिंधु जल संधि को निलंबित करने का फैसला किया। इसके बाद दोनों देशों के बीच जल सहयोग और नदी संबंधी सूचनाओं के आदान-प्रदान को लेकर तनाव और बढ़ गया।पाकिस्तान के लिए सिंधु नदी क्यों महत्वपूर्ण?पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था और कृषि व्यवस्था में सिंधु नदी प्रणाली की महत्वपूर्ण भूमिका है। देश के बड़े हिस्से की खेती और सिंचाई व्यवस्था इसी नदी तंत्र पर निर्भर है। इसलिए सिंधु नदी से जुड़ा कोई भी बदलाव पाकिस्तान के लिए सीधे तौर पर कृषि, जल प्रबंधन और खाद्य सुरक्षा से जुड़ा विषय बन जाता है।विशेषज्ञ यासिर खान के अनुसार, इस पूरे मामले को केवल इस सवाल तक सीमित करना सही नहीं होगा कि भारत पाकिस्तान का पानी रोक देगा या नहीं। उनका कहना है कि नदी का पानी अचानक किसी नल की तरह बंद करना संभव नहीं है। सिंधु जल संधि के तहत भारत को पश्चिमी नदियों के पानी का कुछ निर्धारित उपयोग—जैसे कृषि, सीमित भंडारण और जलविद्युत उत्पादन—की अनुमति भी रही है।असली चिंता पानी से ज्यादा जानकारी कीयासिर खान के मुताबिक पाकिस्तान के लिए बड़ी चिंता नदी के पानी की भविष्यवाणी और समय पर जानकारी से जुड़ी है। पाकिस्तान नदी तंत्र में निचले हिस्से में स्थित है, इसलिए किसानों के लिए यह जानना जरूरी होता है कि नदी में पानी कब और कितना पहुंचेगा। इसी जानकारी के आधार पर वे बुवाई और सिंचाई की योजना बनाते हैं।इसके अलावा बाढ़ और सूखे जैसी परिस्थितियों से निपटने के लिए भी नदी के प्रवाह से जुड़ा डेटा महत्वपूर्ण होता है। ऐसे में यदि दोनों देशों के बीच डेटा साझा करने और विवाद समाधान के लिए बनाए गए तंत्र राजनीतिक तनाव की वजह से प्रभावित होते हैं, तो नदी का प्रवाह जारी रहने के बावजूद जल प्रबंधन में अनिश्चितता बढ़ सकती है।कुल मिलाकर, सिंधु जल संधि के 66 साल पूरे होने के मौके पर भारत-पाकिस्तान के बीच पानी का मुद्दा एक बार फिर चर्चा के केंद्र में है। मौजूदा परिस्थितियों में यह मामला केवल नदी और पानी तक सीमित नहीं, बल्कि कृषि, जल सुरक्षा और दोनों देशों के बीच संबंधों से भी जुड़ा हुआ है

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