रूस और चीन के बीच बढ़ते व्यापारिक संबंधों ने वैश्विक आर्थिक समीकरणों में नई चर्चा छेड़ दी है। पिछले तीन दशकों में दोनों देशों का द्विपक्षीय व्यापार कई गुना बढ़कर 200 अरब डॉलर से अधिक पहुंच गया है। इसके मुकाबले भारत और रूस के बीच व्यापार करीब 70 अरब डॉलर के स्तर पर है। भारत और रूस ने वर्ष 2030 तक द्विपक्षीय व्यापार को 100 अरब डॉलर तक पहुंचाने का लक्ष्य रखा है।रूस-चीन के बढ़ते आर्थिक रिश्तों में ऊर्जा क्षेत्र की महत्वपूर्ण भूमिका है। रूस के प्रमुख ऊर्जा क्षेत्र के अधिकारियों के अनुसार, दोनों देश मिलकर दुनिया के ऊर्जा उत्पादन में बड़ी हिस्सेदारी रखते हैं। मध्य-पूर्व में जारी अस्थिरता के बीच रूस का नॉर्दर्न सी रूट भी भविष्य के महत्वपूर्ण ऊर्जा एवं व्यापारिक मार्ग के रूप में उभर रहा है।वहीं, भारत और रूस के बीच व्यापार में भी हाल के वर्षों में तेजी देखने को मिली है। भारत रूस से मुख्य रूप से कच्चा तेल, कोयला, पेट्रोलियम उत्पाद और उर्वरक आयात करता है, जबकि भारत की ओर से रूस को दवाएं, कंप्यूटर तथा टेलीफोन उपकरण सहित कई उत्पाद निर्यात किए जाते हैं।हालांकि, रूस से बड़ी मात्रा में कच्चा तेल खरीदने के कारण भारत का रूस के साथ व्यापार घाटा काफी बढ़ गया है। ऐसे में दोनों देशों के बीच व्यापार को केवल ऊर्जा आयात तक सीमित रखने के बजाय रक्षा, फार्मा, कृषि, तकनीक, मशीनरी, इलेक्ट्रॉनिक्स और अन्य क्षेत्रों में भारतीय निर्यात बढ़ाने पर जोर देने की आवश्यकता है।भारत-रूस के बीच स्थानीय मुद्राओं में व्यापार और वित्तीय लेन-देन को बढ़ावा देने की दिशा में भी महत्वपूर्ण कदम उठाए जा रहे हैं। इससे अमेरिकी डॉलर पर निर्भरता कम करने और दोनों देशों के बीच आर्थिक सहयोग को मजबूत करने में मदद मिल सकती है।