भारत द्वारा सिंधु जल संधि के क्रियान्वयन पर रोक संबंधी फैसले के बाद पाकिस्तान में इसके संभावित प्रभावों को लेकर चिंता लगातार बढ़ रही है। अब तक इस मुद्दे को मुख्य रूप से कृषि और सिंचाई से जोड़कर देखा जा रहा था, लेकिन अब पर्यटन उद्योग पर भी इसके असर की आशंका जताई जा रही है।पाकिस्तान के उत्तरी क्षेत्रों की प्रसिद्ध पर्यटन स्थलों—जैसे नारन-काघन घाटी, सैफुल मलूक झील, आंसू झील और खानपुर बांध—से जुड़े स्थानीय लोगों, होटल व्यवसायियों, टूर ऑपरेटरों और छोटे कारोबारियों का कहना है कि इन स्थानों की पहचान नदियों और जल स्रोतों से है। यदि भविष्य में जल प्रवाह प्रभावित होता है, तो पर्यटन गतिविधियों में कमी आने से हजारों परिवारों की आजीविका पर प्रतिकूल असर पड़ सकता है।पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था का बड़ा हिस्सा कृषि पर निर्भर है, जिसमें सिंधु नदी प्रणाली की महत्वपूर्ण भूमिका है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि सीमा-पार जल प्रबंधन को लेकर अनिश्चितता बनी रहती है, तो इसका प्रभाव खेती, पनबिजली उत्पादन, जैव विविधता, पेयजल आपूर्ति और इको-टूरिज्म जैसे क्षेत्रों पर भी दिखाई दे सकता है।इस बीच भारत के जलशक्ति मंत्री सीआर पाटिल ने हाल ही में कहा है कि पाकिस्तान को जाने वाले पानी को रोकने की दिशा में कार्ययोजना पर काम किया जा रहा है और वर्ष 2028 तक इसे लागू करने का लक्ष्य रखा गया है।, पाकिस्तान के वरिष्ठ अधिवक्ता मलिक अशफाक ने पाकिस्तान की सरकारी समाचार एजेंसी से बातचीत में कहा कि पानी देश की अर्थव्यवस्था और लाखों लोगों की आजीविका का आधार है। उनके अनुसार यदि जल प्रबंधन को लेकर समाधान नहीं निकला, तो कृषि, ऊर्जा और पर्यटन सहित कई क्षेत्रों को गंभीर चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है।कि दोनों देशों के बीच जल संसाधनों से जुड़े मुद्दों का समाधान संवाद और अंतरराष्ट्रीय समझौतों के अनुरूप किया जाना आवश्यक है, ताकि सीमावर्ती क्षेत्रों में रहने वाले लोगों की आजीविका और पर्यावरणीय संतुलन पर प्रतिकूल प्रभाव न पड़े।