रूस और चीन के बीच लगातार मजबूत होते सैन्य संबंधों ने भारत की रणनीतिक चिंताओं को बढ़ा दिया है। रूसी मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, 2 से 3 जून के बीच पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (PLA) की एक निरीक्षण टीम ने रूस के पूर्वी सैन्य जिले के विभिन्न सैन्य ठिकानों का दौरा किया। इस दौरान प्रतिनिधिमंडल ने सुदूर-पूर्वी ज्यूइश ऑटोनॉमस रीजन में स्थित एयर डिफेंस मिसाइल यूनिट का भी निरीक्षण किया।रूसी समाचार एजेंसी TASS के अनुसार यह दौरा चीन, रूस, कजाकिस्तान, किर्गिस्तान और ताजिकिस्तान के बीच हुए पुराने सैन्य विश्वास-निर्माण समझौतों के तहत नियमित निरीक्षण प्रक्रिया का हिस्सा था। रूसी अधिकारियों ने इसे तीन दशक पुराने सैन्य पारदर्शिता और विश्वास बढ़ाने वाले तंत्र की सफलता का प्रमाण बताया।दौरे के दौरान चीनी प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व कर रहे सीनियर कर्नल लियू जिन्सॉन्ग ने रूसी सैन्य नियंत्रण प्रणाली की पारदर्शिता, संगठनात्मक व्यवस्था और लॉजिस्टिक सहयोग की सराहना की। उन्होंने कहा कि दोनों देशों का रणनीतिक सहयोग क्षेत्रीय विकास और आपसी हितों को और मजबूत करेगा।इस बीच, रूसी राष्ट्रपति Vladimir Putin ने रूस और चीन को “प्राकृतिक सहयोगी और साझेदार” बताते हुए कहा कि दोनों देशों के बीच बढ़ता सैन्य सहयोग किसी तीसरे देश के खिलाफ नहीं है। हालांकि, का मानना है कि इस बढ़ती निकटता के भू-राजनीतिक प्रभावों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

भारत दशकों से अपने सैन्य उपकरणों और हथियार प्रणालियों के लिए रूस पर निर्भर रहा है। वर्तमान में भारतीय सेना, वायु सेना और नौसेना में उपयोग होने वाले बड़ी संख्या में हथियार और प्लेटफॉर्म रूसी या पूर्व सोवियत मूल के हैं।भारत की वायु रक्षा प्रणाली में भी रूस निर्मित अत्याधुनिक S-400 मिसाइल सिस्टम, इगला-एस MANPADS, कुब (KUB) तथा पेचोरा (Pechora) जैसे एयर डिफेंस सिस्टम महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। ऐसे में रूस और चीन के बीच बढ़ता सैन्य सहयोग भारत के लिए चिंता का विषय बन सकता है।यदि चीन को रूसी सैन्य प्रणालियों के संचालन, क्षमताओं अथवा संभावित कमजोरियों के बारे में अधिक जानकारी प्राप्त होती है, तो भविष्य में भारत की सुरक्षा चुनौतियां बढ़ सकती हैं। इसके अलावा, भारत-चीन तनाव की स्थिति में रूस द्वारा तटस्थ रुख अपनाने या सैन्य आपूर्ति में देरी होने की आशंका भी भारत की रणनीतिक गणनाओं को प्रभावित कर सकती है।रूस-चीन सैन्य सहयोग में हो रही यह बढ़ोतरी एशिया की बदलती सामरिक परिस्थितियों का संकेत है, जिस पर भारत की सुरक्षा एजेंसियां और रणनीतिक विशेषज्ञ लगातार नजर बनाए हुए हैं।