अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अगले सप्ताह तुर्की की राजधानी अंकारा में आयोजित होने जा रहे नाटो (NATO) शिखर सम्मेलन में हिस्सा लेंगे। 7 और 8 जुलाई को होने वाले इस सम्मेलन में सैन्य गठबंधन के सभी 32 सदस्य देशों के राष्ट्राध्यक्ष और शीर्ष नेता शामिल होंगे। हालांकि इस बार सम्मेलन से अधिक चर्चा ट्रंप और तुर्की के राष्ट्रपति रेसेप तैयप एर्दोगन के बीच प्रस्तावित द्विपक्षीय बैठक को लेकर हो रही है।रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि इस मुलाकात के दौरान दोनों देशों के बीच लंबे समय से अटके रक्षा सहयोग पर अहम प्रगति देखने को मिल सकती है। विशेष रूप से तुर्की के स्वदेशी KAAN स्टील्थ फाइटर जेट कार्यक्रम के लिए अमेरिकी F110 जेट इंजन की आपूर्ति को लेकर सकारात्मक घोषणा की संभावना जताई जा रही है।मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, पिछले महीने ट्रंप ने संकेत दिया था कि वह तुर्की की रक्षा आवश्यकताओं को लेकर सकारात्मक रुख अपनाएंगे और राष्ट्रपति एर्दोगन को निराश नहीं करना चाहते। माना जा रहा है कि अमेरिका तुर्की को जनरल इलेक्ट्रिक के F110 इंजन उपलब्ध कराने की मंजूरी दे सकता है। इन इंजनों का उपयोग तुर्की अपने महत्वाकांक्षी KAAN स्टील्थ फाइटर विमान परियोजना में करना चाहता है।इस्तांबुल स्थित थिंक टैंक ‘एडम’ के निदेशक सिनान उल्गेन के अनुसार, तुर्की को लगभग 40 F110 इंजन मिलने की संभावना है। उन्होंने कहा कि इन इंजनों की आपूर्ति लंबे समय से विभिन्न प्रक्रियागत और राजनीतिक कारणों से अटकी हुई थी, लेकिन अब इन बाधाओं को दूर करने की दिशा में काम हो रहा है। तुर्की ने पहले ही KAAN के कुछ प्रोटोटाइप तैयार कर लिए हैं, जो F110 इंजन के साथ सफल परीक्षण उड़ानें भी भर चुके हैं। अब बड़े पैमाने पर उत्पादन शुरू करने के लिए इंजन की नियमित आपूर्ति का इंतजार किया जा रहा है। कि F110 इंजन की मंजूरी मिलने के बावजूद F-35 लड़ाकू विमान कार्यक्रम को लेकर दोनों देशों के बीच जारी विवाद का तत्काल समाधान आसान नहीं होगा। तुर्की को वर्ष 2019 में रूसी S-400 एयर डिफेंस सिस्टम खरीदने के बाद अमेरिका ने F-35 कार्यक्रम से बाहर कर दिया था। इसके साथ ही अमेरिका ने CAATSA कानून के तहत तुर्की पर प्रतिबंध भी लगाए थे, जिससे दोनों देशों के रणनीतिक संबंधों में तनाव बढ़ गया। राष्ट्रपति ट्रंप यदि चाहें तो S-400 और F-35 विवाद को समाप्त करने की राजनीतिक पहल कर सकते हैं। हालांकि CAATSA प्रतिबंध हटाने के लिए अमेरिकी कांग्रेस की मंजूरी आवश्यक होगी। ऐसे में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि ट्रंप इस मुद्दे पर कांग्रेस को कितना सहमत कर पाते हैं और इसके लिए कितनी राजनीतिक इच्छाशक्ति दिखाते हैं।ट्रंप का यह दौरा एक और वजह से भी खास माना जा रहा है। वह वर्ष 2015 में तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा के बाद तुर्की का दौरा करने वाले पहले अमेरिकी राष्ट्रपति होंगे। ऐसे में यह यात्रा केवल नाटो सम्मेलन तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि अमेरिका और तुर्की के बीच रक्षा, सुरक्षा और रणनीतिक साझेदारी के भविष्य को भी नई दिशा दे सकती है।अब पूरी दुनिया की नजर अंकारा में होने वाली ट्रंप-एर्दोगन बैठक पर टिकी है। यदि दोनों देशों के बीच रक्षा सहयोग को लेकर कोई ठोस समझौता होता है, तो इसका प्रभाव केवल द्विपक्षीय संबंधों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि नाटो की सामूहिक सुरक्षा रणनीति और क्षेत्रीय शक्ति संतुलन पर भी दूरगामी असर पड़ सकता है।