
अरावली पहाड़ियों की परिभाषा को लेकर चल रहे विवाद पर सुप्रीम कोर्ट ने कड़ा और स्पष्ट रुख अपनाते हुए कहा है कि यह मामला केवल तकनीकी व्याख्या तक सीमित नहीं है, बल्कि देश के पर्यावरणीय भविष्य से गहराई से जुड़ा हुआ है। शीर्ष अदालत ने दो टूक शब्दों में कहा कि अरावली क्षेत्र में किसी भी प्रकार का अवैध खनन बर्दाश्त नहीं किया जाएगा, क्योंकि इसके प्रभाव अपूरणीय और दूरगामी होते हैं।सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अरावली पर्वतमाला की एक वैज्ञानिक, व्यापक और स्पष्ट परिभाषा तय करने के लिए एक हाई-पावर्ड एक्सपर्ट कमेटी का गठन किया जाएगा। इस समिति में पर्यावरण, वानिकी, भू-विज्ञान और अन्य संबंधित क्षेत्रों के स्वतंत्र विशेषज्ञों को शामिल किया जाएगा, ताकि निर्णय पूरी तरह वैज्ञानिक और पर्यावरणीय दृष्टिकोण पर आधारित हो।अदालत ने सभी पक्षकारों, एमिकस क्यूरी सहित, को निर्देश दिया है कि वे चार सप्ताह के भीतर समिति के संभावित सदस्यों के नाम और अपने सुझाव प्रस्तुत करें। न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि इस मामले में पारदर्शिता और विशेषज्ञता सर्वोपरि होगी।सुप्रीम कोर्ट ने अपने उस पूर्व आदेश पर लगी रोक को भी आगे बढ़ा दिया है, जिसमें केवल 100 मीटर से अधिक ऊंचाई वाली पहाड़ियों को ही अरावली मानने की सिफारिश की गई थी। पर्यावरण मंत्रालय की समिति द्वारा दी गई इस सिफारिश को अदालत पहले ही पुनर्विचार योग्य मानते हुए स्थगित कर चुकी है। अदालत का मानना है कि ऐसी सीमित परिभाषा अरावली जैसे संवेदनशील पारिस्थितिकी तंत्र को गंभीर नुकसान पहुंचा सकती है।सुनवाई के दौरान राजस्थान के कई इलाकों में जारी अवैध खनन का मुद्दा उठाए जाने पर सुप्रीम कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया।
अदालत ने राजस्थान सरकार के वकील को तत्काल प्रभावी कार्रवाई सुनिश्चित करने के निर्देश देते हुए कहा कि अरावली जैसा नाजुक पर्यावरणीय क्षेत्र किसी भी तरह का अतिरिक्त दबाव सहन नहीं कर सकता।न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि अवैध खनन भविष्य की पीढ़ियों के पर्यावरणीय अधिकारों पर सीधा हमला है। इसी कारण अदालत इस पूरे मामले की हर पहलू से गहन जांच करेगी। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पिछले वर्ष दिसंबर में पारित अंतरिम आदेश अगले आदेश तक प्रभावी रहेगा।इसके साथ ही सभी हस्तक्षेपकर्ताओं को निर्देश दिया गया है कि वे अपने सुझाव और रिपोर्ट एमिकस क्यूरी के माध्यम से अदालत के समक्ष प्रस्तुत करें। यह फैसला अरावली संरक्षण और पर्यावरणीय न्याय की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।