
सिंधु जल संधि को लेकर भारत और पाकिस्तान के बीच एक बार फिर तनाव की स्थिति बनती दिखाई दे रही है। भारत सरकार ने हिमाचल प्रदेश में प्रस्तावित चिनाब-ब्यास लिंक टनल परियोजना पर काम तेज करने का फैसला किया है, जिससे पाकिस्तान में चिंता और बेचैनी बढ़ गई है।इस परियोजना के तहत चिनाब नदी की ऊपरी धारा से अतिरिक्त जल को लगभग 8.7 किलोमीटर लंबी सुरंग के माध्यम से ब्यास नदी बेसिन में स्थानांतरित किया जाएगा। योजना के अनुसार करीब 19 लाख एकड़ फीट पानी ब्यास नदी में भेजा जाएगा। इसके साथ ही सलाल बांध की गाद प्रबंधन क्षमता को पुनर्स्थापित करने का कार्य भी किया जाएगा। दोनों परियोजनाओं की अनुमानित लागत लगभग 2600 करोड़ रुपये बताई गई है।पाकिस्तान की आपत्ति का मुख्य कारण 1960 की सिंधु जल संधि है, जिसके तहत रावी, ब्यास और सतलुज नदियों का जल भारत को तथा सिंधु, झेलम और चिनाब नदियों का जल पाकिस्तान को आवंटित किया गया था। पाकिस्तान का आरोप है कि चिनाब नदी के जल को दूसरे बेसिन में मोड़ना संधि की मूल भावना के विपरीत है और इससे उसके कृषि एवं सिंचाई तंत्र पर प्रभाव पड़ सकता है।भारत का कहना है कि वह अपने अधिकार क्षेत्र में उपलब्ध जल संसाधनों का पूर्ण उपयोग करने के लिए प्रतिबद्ध है। सरकार के अनुसार, परियोजना का उद्देश्य देश के भीतर जल प्रबंधन को बेहतर बनाना और उपलब्ध संसाधनों का अधिकतम उपयोग सुनिश्चित करना है।हाल ही में पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय ने इस परियोजना पर आपत्ति जताते हुए इसे सिंधु जल संधि के उल्लंघन की आशंका से जोड़ा है।
वहीं पाकिस्तान के पूर्व सीनेटर और पंजाब प्रांत के पूर्व सिंचाई मंत्री मोहसिन लगारी ने भी इस परियोजना को लेकर चिंता व्यक्त की है और नदी जल के अंतर-बेसिन हस्तांतरण पर सवाल उठाए हैं।चिनाब-ब्यास लिंक परियोजना पर 1 अगस्त से कार्य प्रारंभ करने की तैयारी है, जबकि इसके निर्माण को पूरा करने की समयसीमा 31 जुलाई 2029 निर्धारित की गई है। इस महत्वाकांक्षी परियोजना को भारत की जल प्रबंधन रणनीति में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।फिलहाल, इस परियोजना ने दोनों देशों के बीच जल संसाधनों और सिंधु जल संधि के भविष्य को लेकर नई बहस छेड़ दी है।