गोंडवाना आदिवासी कला केंद्र

भारतीय प्रधानमंत्री के नस्लीय चित्रण पर चिंता और वैश्विक मीडिया की जिम्मेदारी,

ftenposten द्वारा प्रकाशित एक कार्टून, जिसमें भारत के प्रधानमंत्री Narendra Modi को “सपेरे” के रूप में दर्शाया गया, ने दुनिया भर के भारतीयों और लोकतांत्रिक मूल्यों में विश्वास रखने वाले लोगों के बीच गहरी चिंता पैदा की है। यह केवल किसी एक व्यक्ति का अपमान नहीं, बल्कि उन सांस्कृतिक रूढ़ियों और नस्लीय पूर्वाग्रहों की पुनरावृत्ति है जिन्हें दशकों से एशियाई और विशेषकर भारतीय समाज के खिलाफ इस्तेमाल किया जाता रहा है।भारत आज विज्ञान, तकनीक, अंतरिक्ष, लोकतंत्र और वैश्विक अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। इसके बावजूद भारतीयों को “स्नेक चार्मर”, “रहस्यमयी” या “पिछड़े समाज” जैसी छवियों में बांधना औपनिवेशिक मानसिकता की याद दिलाता है। यह वही दृष्टिकोण है जिसे प्रसिद्ध विचारक Edward Said ने अपनी पुस्तक Orientalism में “ओरिएंटलिज़्म” कहा था — यानी पूर्वी समाजों को जानबूझकर रूढ़िवादी और हीन रूप में प्रस्तुत करना।प्रेस की स्वतंत्रता लोकतंत्र का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है। लेकिन अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और नस्लीय या सांस्कृतिक अपमान के बीच स्पष्ट अंतर होना चाहिए। यदि किसी अफ्रीकी, यहूदी या अन्य समुदाय के नेता को नस्लीय रूढ़ियों के आधार पर चित्रित किया जाए तो उसे अस्वीकार्य माना जाएगा। ऐसे में भारतीयों और एशियाई समाजों के प्रति इस प्रकार की प्रस्तुति को भी समान संवेदनशीलता और जिम्मेदारी के साथ देखा जाना चाहिए।भारत के प्रधानमंत्री का चुनाव 1.4 अरब नागरिकों ने लोकतांत्रिक प्रक्रिया के माध्यम से किया है। किसी भी निर्वाचित नेता की आलोचना लोकतंत्र का हिस्सा हो सकती है, लेकिन आलोचना को नस्लीय प्रतीकों और औपनिवेशिक स्टीरियोटाइप्स का सहारा नहीं लेना चाहिए।वैश्विक मीडिया संस्थानों से आग्रह करते हैं कि वे सांस्कृतिक विविधता, नस्लीय संवेदनशीलता और जिम्मेदार पत्रकारिता के मूल्यों का सम्मान करें। दुनिया को जोड़ने का काम करने वाला मीडिया यदि पूर्वाग्रहों को बढ़ावा देगा, तो यह वैश्विक संवाद और आपसी सम्मान को कमजोर करेगा।यह समय है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के साथ-साथ मानव गरिमा, सांस्कृतिक सम्मान और समानता को भी उतना ही महत्व दिया जाए।

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