पुणे पोर्श हादसा: सुप्रीम कोर्ट ने तीन आरोपियों को दी जमानत, माता-पिता की जिम्मेदारी पर जताई सख्त चिंता,

महाराष्ट्र के पुणे जिले में हुए चर्चित पोर्श कार हादसे से जुड़े मामले में सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसला सुनाया है। शीर्ष अदालत ने सबूतों से छेड़छाड़ और ब्लड सैंपल बदलने के आरोप में गिरफ्तार तीन आरोपियों को जमानत दे दी है। जस्टिस बी. वी. नागरत्ना और जस्टिस उज्ज्वल भुइयां की पीठ ने आशीष सतीश मित्तल, आदित्य अविनाश सूद और अमर संतोष गायकवाड़ को यह राहत प्रदान की।सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि तीनों आरोपी पिछले लगभग 18 महीनों से न्यायिक हिरासत में हैं और मुकदमे की प्रकृति को देखते हुए उनकी निरंतर कैद से उन्हें गंभीर नुकसान हो सकता है। कोर्ट ने निर्देश दिया कि तीनों आरोपियों को संबंधित निचली अदालत के समक्ष पेश किया जाए और निचली अदालत द्वारा निर्धारित शर्तों के अधीन उन्हें जमानत पर रिहा किया जाए।इस मामले में आशीष सतीश मित्तल मुख्य आरोपी नाबालिग के पिता का मित्र है। आदित्य अविनाश सूद उस युवक का पिता है जो हादसे के समय पोर्श कार की पिछली सीट पर बैठा था। वहीं अमर संतोष गायकवाड़ पर आरोप है कि उसने बिचौलिए की भूमिका निभाते हुए ब्लड सैंपल में हेरफेर कराने के लिए तीन लाख रुपये लिए थे। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि कार की पिछली सीट पर बैठे नाबालिग के खिलाफ कोई ठोस आरोप नहीं है और उसके खिलाफ आरोप तय होने की संभावना भी कम है। कोर्ट ने यह भी नोट किया कि दुर्घटना के लिए जिम्मेदार ड्राइवर के खिलाफ अधिकतम सजा तीन वर्ष की है, जबकि नाबालिग के खिलाफ मामला किशोर न्याय बोर्ड के समक्ष लंबित है।हालांकि जमानत देते हुए भी सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने इस पूरे प्रकरण पर गहरी चिंता व्यक्त की। जस्टिस बी. वी. नागरत्ना ने टिप्पणी करते हुए कहा कि ऐसे माता-पिता बेहद गैर-जिम्मेदार हैं जो अपने नाबालिग बच्चों को तेज रफ्तार और महंगी गाड़ियां उपलब्ध कराते हैं और उन्हें शराब व नशीले पदार्थों के सेवन के साथ जश्न मनाने की छूट देते हैं।जस्टिस नागरत्नाी ने कहा,
“माता-पिता अपने बच्चों पर नियंत्रण न रख पाने के लिए दोषी हैं। नशे में जश्न मनाने के बाद तेज रफ्तार से वाहन चलाना और सड़क पर निर्दोष लोगों की जान लेना अत्यंत गंभीर विषय है। कानून को ऐसे मामलों में सख्ती से कार्रवाई करनी चाहिए।”उन्होंने आगे कहा कि माता-पिता की भूमिका केवल संसाधन उपलब्ध कराने तक सीमित नहीं होनी चाहिए। बच्चों से संवाद, उनके साथ समय बिताना और उन्हें सही-गलत की समझ देना बेहद आवश्यक है। उन्होंने यह भी टिप्पणी की कि कई बार माता-पिता बच्चों को समय देने के बजाय पैसा, एटीएम कार्ड और महंगे साधन थमा देते हैं, जो आगे चलकर गंभीर सामाजिक समस्याओं का कारण बनते हैं।

पूरा मामला 19 मई 2024 का है, जब पुणे में एक तेज रफ्तार पोर्श कार ने एक बाइक को टक्कर मार दी थी। टक्कर इतनी भीषण थी कि बाइक सवार आईटी प्रोफेशनल की मौके पर ही मौत हो गई। हादसे के बाद आरोपी नाबालिग को लगभग 14 घंटे के भीतर कुछ शर्तों के साथ जमानत दे दी गई थी।उस समय अदालत ने नाबालिग को 15 दिनों तक ट्रैफिक पुलिस के साथ काम करने और सड़क सुरक्षा पर निबंध लिखने का निर्देश दिया था। इस आदेश को लेकर देशभर में तीखी प्रतिक्रिया हुई, जिसके बाद मामला और गंभीर हो गया। बाद में अदालत ने नाबालिग की जमानत रद्द कर दी।पुलिस जांच में सामने आया कि आरोपी नाबालिग शराब के नशे में था और अत्यधिक तेज गति से वाहन चला रहा था। इसके बाद सबूतों से छेड़छाड़ और ब्लड सैंपल बदलने जैसे गंभीर आरोप सामने आए, जिसके चलते यह मामला राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बन गया।सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला न केवल कानूनी दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि यह समाज और अभिभावकों के लिए भी एक कड़ा संदेश देता है कि नाबालिगों को वाहन सौंपना और उनकी गतिविधियों पर नियंत्रण न रखना कितनी बड़ी त्रासदी का कारण बन सकता है। अदालत की टिप्पणियां भविष्य में ऐसे मामलों में जवाबदेही तय करने की दिशा में अहम मानी जा रही हैं।

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