
अरब जगत में लंबे समय तक एक-दूसरे के करीबी सहयोगी रहे सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) के रिश्तों में बीते कुछ महीनों से तीखा तनाव देखने को मिल रहा है। दोनों ताकतवर मुस्लिम देशों के बीच यह टकराव अब केवल कूटनीतिक मतभेद तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यमन समेत क्षेत्रीय प्रभाव और नेतृत्व को लेकर खुली प्रतिस्पर्धा में बदलता नजर आ रहा है। कभी एक मंच पर साथ खड़े रहने वाले सऊदी और यूएई आज अलग-अलग गुटों में एक-दूसरे के खिलाफ मोर्चाबंदी कर रहे हैं।इस बढ़ते टकराव के बीच पूरी दुनिया की नजर अमेरिका पर टिकी है। अमेरिका के दोनों देशों से दशकों पुराने रणनीतिक और आर्थिक रिश्ते रहे हैं। ऐसे में यह सवाल अहम हो गया है कि यदि हालात और बिगड़ते हैं तो अमेरिका किसका पक्ष लेगा। खासकर डोनाल्ड ट्रंप की भूमिका को लेकर अटकलें तेज हैं, क्योंकि उनके कार्यकाल में मिडिल ईस्ट नीति अक्सर अप्रत्याशित रही है।विशेषज्ञों के अनुसार, सऊदी-यूएई के बीच मतभेदों की जड़ यमन में प्रभाव को लेकर शुरू हुई प्रतिस्पर्धा है। यमन संकट के शुरुआती दौर में दोनों देश एक ही गठबंधन का हिस्सा थे, लेकिन समय के साथ-साथ वहां अपने-अपने हित साधने की होड़ ने रिश्तों में दरार पैदा कर दी। यही दरार अब क्षेत्रीय राजनीति में खुलकर सामने आ रही है।मिडिल ईस्ट आई (MEE) की एक रिपोर्ट के अनुसार, यह वही सऊदी और यूएई हैं जिनके कहने पर डोनाल्ड ट्रंप ने वर्ष 2017 में कतर के खिलाफ बेहद सख्त रुख अपनाया था और उसे “आतंकवाद को बढ़ावा देने वाला देश” तक कह दिया था। लेकिन महज नौ साल के भीतर हालात पलट गए हैं। अब वही दो सहयोगी आपस में उलझ गए हैं और ट्रंप इस मुद्दे पर चुप्पी साधे हुए हैं।2017 के कतर संकट के दौरान ट्रंप ने बिना देर किए सऊदी-यूएई के पक्ष में बयानबाजी की थी, लेकिन इस बार उन्होंने वैसी जल्दबाजी नहीं दिखाई है। सवाल यह है कि ट्रंप कब तक इस मुद्दे पर चुप रहेंगे और क्या वे किसी एक पक्ष की ओर झुकेंगे।यूएई आज अरब जगत में इजरायल का सबसे करीबी अरब साझेदार बनकर उभरा है। अमेरिका के लिए इजरायल की सुरक्षा और रणनीतिक हित सर्वोच्च प्राथमिकता रहे हैं। ऐसे में यूएई का महत्व अपने आप बढ़ जाता है। वहीं दूसरी ओर सऊदी अरब का कद, उसकी धार्मिक-राजनीतिक हैसियत और आर्थिक ताकत को भी अमेरिका नजरअंदाज नहीं कर सकता।CIA के पूर्व सीनियर मिडिल ईस्ट एनालिस्ट विलियम अशर ने MEE से बातचीत में कहा, “ऐसा कोई संकेत नहीं मिला है कि ट्रंप किसी एक पक्ष का खुलकर समर्थन कर रहे हैं। किसी एक को चुनना अमेरिका के लिए रणनीतिक रूप से फायदेमंद नहीं होगा।”
डोनाल्ड ट्रंप की मिडिल ईस्ट नीति में उनके तीन प्रमुख सलाहकारों की भूमिका अहम मानी जाती है। इनमें उनके दामाद जेरेड कुशनर, अरबपति गोल्फिंग दोस्त स्टीव विटकॉफ और लेबनानी-अमेरिकी अरबपति टॉम बैरक शामिल हैं।जेरेड कुशनर की प्राइवेट इक्विटी फर्म “एफिनिटी पार्टनर्स” को सऊदी अरब, यूएई और कतर—तीनों से फंड मिला है। वहीं स्टीव विटकॉफ भी सरकार में शामिल होने से पहले कतर के साथ कारोबारी सौदे कर चुके हैं। ऐसे में ट्रंप परिवार और उनके करीबी सलाहकारों के पूरे खाड़ी क्षेत्र में व्यापक आर्थिक हित जुड़े हुए हैं, जो किसी एक पक्ष को चुनना और कठिन बना देते हैं।हालांकि राष्ट्रीय स्तर पर डील-मेकिंग को प्राथमिकता देने वाले ट्रंप के लिए सऊदी अरब ज्यादा बड़े अवसर पेश करता है। सऊदी अरब का सकल घरेलू उत्पाद (GDP) यूएई से लगभग दोगुना है। ट्रंप जिस तरह व्यापार और निवेश की भाषा में सोचते हैं, उसे देखते हुए सऊदी अरब उनके लिए ज्यादा आकर्षक बाजार बन सकता है।वॉशिंगटन स्थित अरब गल्फ स्टेट्स इंस्टीट्यूट के अध्यक्ष और कुवैत के पूर्व राजदूत डगलस सिलिमन का कहना है, “ट्रंप प्रशासन दोनों पक्षों के साथ अच्छे संबंध बनाए रखने के लिए पूरी तरह तैयार है। मुझे नहीं लगता कि वे किसी एक को दूसरे पर तरजीह देंगे, क्योंकि दोनों तरफ से निवेश के वादे बेहद बड़े हैं। अरब शासक परिवारों के बीच ऐसे झगड़े कोई नई बात नहीं हैं और आमतौर पर अमेरिका इसमें मध्यस्थ की भूमिका निभाता है।”