गोवर्धन पर्व प्रकृति, गौ-संवर्धन और पर्यावरण संरक्षण का प्रतीक – मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव,

मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने कहा है कि दीपावली के उत्सव की श्रृंखला में आरोग्य, आर्थिक समृद्धि, परिवार एवं समाज समन्वय और पर्यावरण संरक्षण का गहरा संदेश निहित है। उन्होंने कहा कि दीपावली का यह पावन पर्व केवल प्रकाश का नहीं, बल्कि मानवता, समरसता और सतत विकास का उत्सव भी है। दीपावली के अगले दिन मनाया जाने वाला गोवर्धन पर्व प्रकृति, पर्वत और गौ-वंश संरक्षण की भारतीय प्राचीन परंपरा का प्रतीक है।मुख्यमंत्री ने कहा कि इस परंपरा का साक्षात दर्शन हमें भगवान श्रीकृष्ण द्वारा गोवर्धन पर्वत को अपनी कनिष्ठा उंगली पर धारण करने की घटना से मिलता है। मानवता की रक्षा के इसी पावन स्मरण में गोवर्धन पूजन किया जाता है। यह पर्व हमें गौ-धन के संवर्धन, पर्यावरण संरक्षण और ग्राम्य अर्थव्यवस्था के सशक्तीकरण की प्रेरणा देता है। भारतीय समाज की यह जीवनदृष्टि बताती है कि हमारे धर्म और संस्कृति में प्रकृति, पशु, मनुष्य और देवत्व के बीच संतुलन और सह-अस्तित्व का भाव कितना गहराई से जुड़ा है।मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने कहा कि उन्हें यह बताते हुए प्रसन्नता हो रही है कि इस वर्ष प्रदेशभर में गोवर्धन पर्व का आयोजन विशेष रूप से किया जा रहा है। सभी जिलों में यह पर्व लोक अनुष्ठानों, सांस्कृतिक परंपराओं और जनभागीदारी के साथ मनाया जा रहा है। आयोजनों में पशुपालन और दुग्ध उत्पादन के क्षेत्र में नवाचार करने वाले उद्यमियों और किसानों को सम्मानित किया जा रहा है।उन्होंने बताया कि इस अवसर पर पशुपालन, कृषि और सहकारिता विभागों की जन-कल्याणकारी योजनाओं की जानकारी जनता तक पहुँचाने और ग्रामीण आजीविका को सशक्त बनाने के उद्देश्य से दुग्ध उत्पादन एवं वृंदावन ग्राम योजना के विस्तार की गतिविधियाँ प्रारंभ की गई हैं। मुख्यमंत्री ने कहा कि हमारे सभी पर्व और त्यौहार प्रकृति से सह-अस्तित्व और समग्र विकास के भाव से प्रेरित हैं।मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने कहा कि गोवर्धन पर्व इस भावना का सशक्त प्रतीक है। इस दिन लोग गोबर से गोवर्धन पर्वत का प्रतीक बनाकर पूजा करते हैं, जो न केवल धार्मिक आस्था से जुड़ा है, बल्कि पर्यावरणीय दृष्टि से भी अत्यंत सार्थक है।

पर्वत हमारे प्राकृतिक संतुलन, जल संरक्षण, संवर्धन और ऋतुचक्र की स्थिरता में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। यही कारण है कि गोवर्धन पूजन केवल धार्मिक नहीं, बल्कि प्राकृतिक संतुलन और पारिस्थितिकी की रक्षा का संदेश देने वाला पर्व भी है। मुख्यमंत्री ने कहा कि इस पर्व के माध्यम से हम नई पीढ़ी को प्रकृति, पशुधन और पर्यावरण के महत्व से जोड़ने का कार्य कर रहे हैं।उन्होंने कहा कि मध्यप्रदेश अपनी प्राकृतिक संपदा और समृद्ध गौ-वंश के लिए जाना जाता है। गौ-माता में 33 कोटि देवी-देवताओं का वास माना गया है। इसी भावना को आगे बढ़ाते हुए राज्य सरकार ने वर्ष 2024-25 को “गौ-संरक्षण एवं संवर्धन वर्ष” के रूप में मनाया है। मुख्यमंत्री ने कहा कि प्रदेश सरकार पशुपालक किसानों की आय दोगुनी करने के लिए निरंतर कार्य कर रही है।उन्होंने बताया कि वर्तमान में देश के कुल दुग्ध उत्पादन का 9 प्रतिशत मध्यप्रदेश से आता है, और हमारा लक्ष्य इसे 20 प्रतिशत तक ले जाना है। इसके लिए राज्यभर में “दुग्ध समृद्धि संपर्क अभियान” चलाया जा रहा है। इस अभियान के तहत पशुपालकों को घर-घर जाकर पशुओं की नस्ल सुधार, कृत्रिम गर्भाधान, टीकाकरण, पशु स्वास्थ्य, पोषण और संतुलित आहार के बारे में तकनीकी जानकारी दी जा रही है।मुख्यमंत्री ने कहा कि इन सभी प्रयासों का उद्देश्य है कि मध्यप्रदेश आने वाले वर्षों में “भारत की दुग्ध राजधानी” (Milk Capital of India) के रूप में स्थापित हो। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि गोवर्धन पर्व जैसे पावन अवसरों से प्रेरणा लेकर हम न केवल अपनी सांस्कृतिक जड़ों को सशक्त बनाएँगे, बल्कि प्रकृति, पशुधन और पर्यावरण के संरक्षण में भी अग्रणी भूमिका निभाएँगे।

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