
नेपाल ने जब 2017 में चीन की महत्वाकांक्षी बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (BRI) परियोजना में शामिल होने का फैसला किया था, तब इसे दक्षिण एशिया की भू-राजनीति में बड़ा बदलाव माना गया। भारत के बाद नेपाल का चीन की इस रणनीतिक पहल से जुड़ना नई दिल्ली के लिए चिंता का विषय बना, क्योंकि नेपाल लंबे समय से आर्थिक, व्यापारिक और ट्रांजिट मामलों में भारत पर निर्भर रहा है।नेपाल को उम्मीद थी कि BRI के जरिए देश में रेलवे नेटवर्क, सड़कें, सुरंगें, हाइड्रोपावर परियोजनाएं और व्यापारिक कनेक्टिविटी का तेज़ विकास होगा। खासकर चीन-नेपाल रेलवे परियोजना को नेपाल के लिए “गेम चेंजर” बताया गया था, जो तिब्बत को काठमांडू से जोड़ने की योजना थी।लेकिन 9 साल बाद तस्वीर उम्मीदों से काफी अलग दिखाई देती है। BRI से जुड़ी अधिकांश परियोजनाएं अब तक कागज़ों, बैठकों और सेमिनारों तक ही सीमित हैं। नेपाल में BRI के तहत ज़मीनी स्तर पर बेहद कम काम हुआ है।
पोखरा एयरपोर्ट बना विवाद का केंद्र
BRI के तहत चीन ने पोखरा इंटरनेशनल एयरपोर्ट को अपनी उपलब्धि के रूप में पेश किया, लेकिन नेपाल सरकार ने इसे आधिकारिक तौर पर BRI परियोजना मानने से परहेज किया। बाद में यह परियोजना भ्रष्टाचार के आरोपों और वित्तीय अनियमितताओं के विवाद में फंस गई। एयरपोर्ट की व्यावसायिक उपयोगिता भी सवालों के घेरे में रही और अब नेपाल चाहता है कि भारत इसे मान्यता दे ताकि अंतरराष्ट्रीय उड़ानों और व्यापारिक गतिविधियों को बढ़ावा मिल सके।
क्यों अटका नेपाल-चीन BRI सहयोग?
नेपाल और चीन के बीच BRI परियोजनाओं को लेकर कई स्तरों पर सहमति नहीं बन पाई।
- नेपाल अनुदान आधारित निवेश चाहता था, जबकि चीन अधिकतर परियोजनाओं को कर्ज मॉडल पर आगे बढ़ाना चाहता था।
- नेपाल में यह चिंता बढ़ी कि भारी चीनी कर्ज देश की अर्थव्यवस्था पर बोझ बन सकता है।
- लगातार बदलती सरकारों के कारण नीतियों में स्थिरता नहीं रही।
- हिमालयी भूभाग रेलवे और बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स के लिए बेहद चुनौतीपूर्ण है, जिससे लागत बहुत अधिक बढ़ जाती है।
- नेपाल हमेशा भारत और चीन के बीच संतुलन बनाने की नीति अपनाता रहा है, इसलिए उसने BRI को लेकर सतर्क रुख बनाए रखा।
भारत और अमेरिका का प्रभाव
नेपाल में BRI को लेकर भू-राजनीतिक दबाव भी अहम कारण माना जाता है। भारत BRI को दक्षिण एशिया में चीन के बढ़ते प्रभाव के रूप में देखता है, जबकि अमेरिका इसे चीन की रणनीतिक विस्तारवादी नीति का हिस्सा मानता है।विदेश नीति विशेषज्ञों का मानना है कि यदि BRI की बड़ी परियोजनाएं वास्तव में जमीन पर उतरती हैं, तो नेपाल के लिए भारत, चीन और अमेरिका के बीच संतुलन बनाए रखना और कठिन हो सकता है।
वर्तमान सरकार का सतर्क रुख
हालिया रिपोर्टों के अनुसार नेपाल और चीन के बीच BRI को आगे बढ़ाने को लेकर कोई बड़ी सक्रिय बातचीत नहीं हुई है। नेपाल सरकार ने सार्वजनिक रूप से चीन के प्रति अपनी नीति में बदलाव से इनकार किया है, लेकिन BRI पर खुलकर जोर भी नहीं दिया गया। नेपाल अब BRI को लेकर अधिक व्यावहारिक और सतर्क दृष्टिकोण अपना रहा है। नौ वर्षों के अनुभव ने यह स्पष्ट कर दिया है कि बड़े वादों के बावजूद BRI नेपाल में अपेक्षित आर्थिक बदलाव नहीं ला सका है।