श्रीलंकाई सीमा के पास ईरानी युद्धपोत पर अमेरिकी पनडुब्बी के हमले से मचा विवाद, संसद में उठे सुरक्षा पर गंभीर सवाल,

महासागर क्षेत्र में श्रीलंका की समुद्री सीमा के निकट ईरानी युद्धपोत पर अमेरिकी पनडुब्बी द्वारा किए गए हमले के बाद क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर गंभीर राजनीतिक और कूटनीतिक बहस छिड़ गई है। इस घटना में ईरान के 87 नौसैनिकों की मौत हो गई, जबकि 32 क्रू मेंबरों को जिंदा बचा लिया गया। घटना के बाद श्रीलंका की संसद में विपक्षी दलों ने सरकार की सुरक्षा व्यवस्था और समुद्री निगरानी क्षमता पर तीखे सवाल उठाए हैं।श्रीलंका के विपक्ष के नेता सजित प्रेमदासा ने संसद में इस मुद्दे को उठाते हुए सरकार से जवाब मांगा कि एक विदेशी पनडुब्बी श्रीलंका के एक्सक्लूसिव इकोनॉमिक जोन (EEZ) के इतने करीब कैसे पहुंच गई और सरकार को इसकी जानकारी क्यों नहीं मिली। उन्होंने कहा कि यह घटना देश की समुद्री सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करती है। विपक्ष ने सरकार से पूछा कि क्या श्रीलंका के पास ऐसे आधुनिक रडार सिस्टम और निगरानी उपकरण नहीं हैं, जो समुद्र में चल रही विदेशी पनडुब्बियों और सैन्य गतिविधियों का समय रहते पता लगा सकें।संसद में बोलते हुए प्रेमदासा ने कहा कि यदि किसी अन्य देश की सैन्य पनडुब्बी श्रीलंका की समुद्री सीमा के इतने करीब आकर हमला कर सकती है, तो यह राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए चिंताजनक स्थिति है। उन्होंने सरकार पर देश की सुरक्षा के साथ लापरवाही बरतने का आरोप लगाया और कहा कि समुद्री निगरानी तंत्र को और अधिक मजबूत बनाने की जरूरत है।इस मामले में श्रीलंका सरकार ने संसद में स्पष्ट किया कि जिस स्थान पर ईरानी युद्धपोत को निशाना बनाया गया, वह दक्षिण श्रीलंका के गॉल हार्बर से लगभग 19 नॉटिकल माइल्स यानी करीब 35 किलोमीटर दूर स्थित था। सरकार के अनुसार यह स्थान श्रीलंका के 12 नॉटिकल माइल्स के क्षेत्रीय जल से बाहर आता है।अंतरराष्ट्रीय समुद्री कानून के अनुसार किसी भी देश का युद्धपोत, जो किसी अंतरराष्ट्रीय सशस्त्र संघर्ष में शामिल हो, स्वाभाविक रूप से एक सैन्य लक्ष्य माना जाता है। ऐसे में उस पर हमला करना समुद्री युद्ध के नियमों के तहत वैध माना जा सकता है, बशर्ते वह हमला किसी तटस्थ देश के क्षेत्रीय जल के भीतर न किया गया हो।ईरानी युद्धपोत “आईआरआईएस देना” श्रीलंका के क्षेत्रीय जल से बाहर संचालित हो रहा था। इसलिए समुद्री युद्ध के कानून के तहत इसे एक वैध सैन्य लक्ष्य माना जा सकता है। यदि यह युद्धपोत श्रीलंका के तट से 12 नॉटिकल माइल्स के भीतर होता, तो उस पर हमला अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत अवैध माना जाता।

समुद्री युद्ध का कानून अंतरराष्ट्रीय मानवीय कानून का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, जो समुद्र में होने वाले सशस्त्र संघर्ष के दौरान सैन्य बलों, नागरिकों और तटस्थ देशों के अधिकारों और सुरक्षा से जुड़े नियम तय करता है। इन नियमों का उद्देश्य युद्ध के दौरान भी कुछ मानवीय और कानूनी सीमाओं को बनाए रखना है।, भले ही किसी युद्ध की शुरुआत को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विवाद हो, लेकिन एक बार सशस्त्र संघर्ष शुरू होने के बाद समुद्र में होने वाली सैन्य कार्रवाइयों को समुद्री युद्ध के स्थापित नियमों का पालन करना आवश्यक होता है। यही कारण है कि इस घटना को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी कानूनी और कूटनीतिक चर्चा तेज हो गई है।इस घटना ने हिंद महासागर क्षेत्र की सुरक्षा, समुद्री निगरानी व्यवस्था और अंतरराष्ट्रीय कानून के पालन को लेकर नई बहस को जन्म दे दिया है। श्रीलंका की संसद में इस मुद्दे पर आगे भी चर्चा जारी रहने की संभावना है, जबकि विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह की घटनाएं क्षेत्रीय सुरक्षा संतुलन पर भी असर डाल सकती हैं।

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