विधेयकों पर राज्यपाल की भूमिका पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई, तेलंगाना सरकार ने रखी दलील,

सुप्रीम कोर्ट में बुधवार को राष्ट्रपति और राज्यपालों द्वारा विधेयकों पर मंजूरी देने की समयसीमा तय करने से जुड़े मामले में सुनवाई हुई। मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति बी.आर. गवई की अध्यक्षता वाली पाँच सदस्यीय संविधान पीठ इस महत्वपूर्ण मुद्दे पर विचार कर रही है। पीठ में न्यायमूर्ति सूर्यकांत, न्यायमूर्ति विक्रम नाथ, न्यायमूर्ति पी.एस. नरसिम्हा और न्यायमूर्ति ए.एस. चंदुरकर भी शामिल हैं।सुनवाई के दौरान तेलंगाना सरकार की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता निरंजन रेड्डी ने दलील दी कि राज्यपाल अभियोजन स्वीकृति देने के मामलों में भी मंत्रिपरिषद की सलाह लेने के लिए बाध्य होते हैं। उन्होंने कहा कि केवल तब, जब कोई मंत्री या स्वयं मुख्यमंत्री किसी आपराधिक मामले में शामिल हों, राज्यपाल को विवेकाधिकार प्राप्त होता है। अन्य स्थितियों में वे मंत्रिपरिषद की सलाह से ही बंधे होते हैं।तेलंगाना सरकार के अधिवक्ता ने संविधान पीठ से यह भी आग्रह किया कि राष्ट्रपति के संदर्भ पर सुनवाई करते समय न्यायालय को इस पहलू पर भी गौर करना चाहिए कि विधेयकों पर राज्यपाल के ‘अंतर्निहित पूर्वाग्रह’ किस प्रकार निर्णय प्रक्रिया को प्रभावित कर सकते हैं।सुनवाई के नौवें दिन अपनी दलील रखते हुए निरंजन रेड्डी ने स्पष्ट कहा कि संविधान के अनुच्छेद 200 के तहत राज्यपाल के पास कोई स्वतंत्र विवेकाधिकार नहीं है। वे मंत्रिपरिषद की सहायता और सलाह लेने के लिए बाध्य होते हैं और यह संवैधानिक प्रावधान राज्यपाल की भूमिका को स्पष्ट करता है।

गौरतलब है कि इस मामले में शीर्ष अदालत यह विचार कर रही है कि राष्ट्रपति और राज्यपालों द्वारा राज्य विधानमंडलों से पारित विधेयकों पर मंजूरी देने की प्रक्रिया में समयसीमा तय की जानी चाहिए या नहीं। कई राज्यों ने यह मुद्दा उठाया है कि विधेयकों को लंबे समय तक लंबित रखने से शासन-प्रक्रिया प्रभावित होती है और यह लोकतांत्रिक सिद्धांतों के अनुरूप नहीं है।संविधान पीठ ने सुनवाई के दौरान विभिन्न पक्षों की दलीलें सुनीं और इस बात पर भी चर्चा की कि यदि समयसीमा निर्धारित की जाती है, तो उसका स्वरूप और प्रकृति कैसी होनी चाहिए। अदालत ने यह भी संकेत दिया कि इस मुद्दे का लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था पर व्यापक असर पड़ सकता है।सुनवाई के अंत में पीठ ने कहा कि मामले की अगली सुनवाई निर्धारित तिथि पर होगी और तब तक सभी पक्ष अपने लिखित जवाब दाखिल कर सकते हैं। यह मामला राज्यपालों की संवैधानिक भूमिका और विधायिका द्वारा पारित विधेयकों की स्वीकृति की प्रक्रिया को लेकर भविष्य में एक महत्वपूर्ण मार्गदर्शक सिद्धांत तय कर सकता है।

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