रंगपंचमी मेले में शामिल होंगे मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव, करीला धाम में करेंगे पूजा-अर्चना,

Mohan Yadav रविवार को Ashoknagar जिले की बहादुरपुर तहसील के ग्राम करीला में रंगपंचमी के अवसर पर आयोजित होने वाले प्रसिद्ध मेले में शामिल होंगे। इस दौरान मुख्यमंत्री माँ जानकी के दर्शन कर प्रदेश की सुख-समृद्धि की कामना करेंगे। साथ ही अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर स्व-सहायता समूहों द्वारा लगाई गई प्रदर्शनी का अवलोकन करेंगे तथा विभिन्न विकास कार्यों का लोकार्पण और शिलान्यास भी करेंगे।करीला धाम श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्रअशोकनगर जिले की बहादुरपुर तहसील अंतर्गत ग्राम पंचायत जसैया के ग्राम करीला में प्रतिवर्ष रंगपंचमी के अवसर पर विशाल मेले का आयोजन किया जाता है। इस वर्ष यह मेला 7 मार्च से 9 मार्च 2026 तक आयोजित किया जा रहा है। धार्मिक मान्यता के अनुसार माँ जानकी ने घने जंगलों के बीच स्थित महर्षि वाल्मीकि के आश्रम में लव-कुश के साथ निवास किया था, जिसके कारण इस स्थान को करीला कहा जाता है। मेले में लगभग 20 लाख श्रद्धालुओं के आगमन को देखते हुए सुरक्षा और अन्य व्यवस्थाओं के व्यापक इंतजाम किए गए हैं।माँ जानकी के दर्शन के लिए उमड़ती है श्रद्धालुओं की भीड़रंगपंचमी के दिन सुबह से ही श्रद्धालुओं का करीला धाम पहुँचना प्रारंभ हो जाता है। दिन और रात दोनों समय लाखों श्रद्धालु माँ जानकी के मंदिर में शीश नवाकर दर्शन लाभ प्राप्त करते हैं और आशीर्वाद लेते हैं। मन्नत पूरी होने पर श्रद्धालु मंदिर परिसर के बाहर राई नृत्य का आयोजन भी करवाते हैं। मंदिर में माँ जानकी के साथ महर्षि वाल्मीकि और लव-कुश की प्राचीन प्रतिमाएँ स्थापित हैं। रंगपंचमी के अवसर पर विशेष रूप से वाल्मीकि गुफा के कपाट भी खोले जाते हैं।भभूति को लेकर विशेष मान्यताकरीला धाम आने वाले श्रद्धालु माँ जानकी के दरबार की भभूति अपने साथ ले जाते हैं। मान्यता है कि इस भभूति को खेतों में फसलों पर छिड़कने से फसल के रोग और इल्ली जैसी समस्याएँ दूर हो जाती हैं। इसी विश्वास के कारण बड़ी संख्या में किसान भी यहाँ आकर दर्शन करते हैं।राई नृत्य की रहती है विशेष धूमकरीला धाम में यह मान्यता है कि जिन दंपत्तियों को संतान नहीं होती, वे यहाँ आकर माँ जानकी से मन्नत मांगते हैं और मुराद पूरी होने पर राई नृत्य करवाते हैं। लोककथा के अनुसार लव-कुश के जन्म के बाद माँ जानकी के अनुरोध पर महर्षि वाल्मीकि ने जन्मोत्सव बड़े उत्साह के साथ मनाया था, जिसमें स्वर्ग से आई अप्सराओं ने नृत्य किया था। उसी परंपरा को आज भी रंगपंचमी के अवसर पर जीवित रखा गया है।मेले में सैकड़ों नृत्यांगनाएँ ओढ़नी से घूँघट डाले, नगाड़ों और मृदंग की थाप पर लम्बे घेरदार लहंगे और पैरों में बंधे घुंघरुओं की खनक के साथ मनमोहक राई नृत्य प्रस्तुत करती हैं। पूरी रात चलने वाले इस नृत्य के बाद भोर में बधाई नृत्य के साथ मेले का समापन होता है।

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