मध्यप्रदेश सरकार 18 फरवरी को विधानसभा में अपना पहला पेपरलेस बजट प्रस्तुत करेगी। यह बजट न केवल डिजिटल प्रक्रिया की दिशा में बड़ा कदम माना जा रहा है, बल्कि आकार के लिहाज से भी पिछले वर्ष की तुलना में अधिक बड़ा होने की संभावना है। बजट को लेकर कर्मचारी संगठनों में विशेष उत्सुकता देखी जा रही है, क्योंकि कई लंबित मांगों पर सरकार से स्पष्ट प्रावधान की अपेक्षा की जा रही है।मध्य प्रदेश राज्य अधिकारी कर्मचारी संघर्ष मोर्चा के अध्यक्ष अशोक पांडे ने मांग की है कि राज्य कर्मचारियों को केंद्र सरकार के समान 3 प्रतिशत महंगाई भत्ता प्रदान किया जाए। उनका कहना है कि यह राशि लंबे समय से लंबित है और बजट में इसका प्रावधान किया जाना चाहिए। उन्होंने स्थाई कर्मियों को सातवें वेतनमान का लाभ देने, दैनिक वेतनभोगियों को नियमित करने तथा अंशकालिक कर्मचारियों को कलेक्टर दर से वेतन देने की मांग भी दोहराई।अशोक पांडे ने कहा कि केंद्र स्तर पर आठवें वेतन आयोग के गठन की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है, लेकिन राज्य स्तर पर अब तक ठोस कार्रवाई नहीं हुई है। कर्मचारी संगठनों की मांग है कि बजट में आठवें वेतन आयोग से संबंधित स्पष्ट घोषणा की जाए। इसके साथ ही दोहरे कराधान पर आपत्ति जताते हुए कर व्यवस्था को सरल बनाने की मांग भी की गई है। कर्मचारियों के लिए घोषित कैशलेस चिकित्सा सुविधा को लागू करने हेतु बजट में पृथक राशि निर्धारित करने की आवश्यकता भी बताई गई।स्वास्थ्य क्षेत्र से जुड़े संगठनों ने भी अपनी मांगें सरकार के समक्ष रखी हैं। समस्त स्वास्थ्य अधिकारी कर्मचारी महासंघ के प्रदेश अध्यक्ष सुरेन्द्र सिंह कौरव ने संविदा स्वास्थ्य कर्मचारियों के लिए विशेष पैकेज की मांग की है, ताकि वेतन विसंगतियां दूर की जा सकें। उन्होंने कहा कि संविदा कर्मचारी नियमित कर्मचारियों के समान कार्य कर रहे हैं, लेकिन वेतन और सुविधाओं में अंतर बना हुआ है।

महासंघ ने नर्सिंग ऑफिसरों को रात्रिकालीन ड्यूटी भत्ता प्रदान करने, स्वशासी मेडिकल कॉलेजों में कार्यरत नर्सिंग स्टाफ को तीसरी एवं चौथी वेतन वृद्धि का लाभ देने तथा वेतन संबंधी असमानताओं को समाप्त करने हेतु बजट में अलग प्रावधान करने की मांग की है।कर्मचारी संगठनों का कहना है कि पिछले बजट में की गई कई घोषणाएं अब तक लागू नहीं हो सकी हैं। ऐसे में 18 फरवरी को पेश होने वाला पेपरलेस बजट कर्मचारियों के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। अब सभी की निगाह इस बात पर है कि सरकार लंबित मांगों पर कितना ठोस और व्यावहारिक निर्णय लेती है।