बशीर बद्र सदी का मकबूल शायर”,किताब का विमोचन एवं तरही मुशायरा,

भोपाल, दिनांक 3 अगस्त 2025, शाम 4.30 बजे, महादेवी वर्मा हॉल हिन्दी भवन भोपाल में आयोजित हुआ इस सदी के मशहूर शायर डॉ. बशीर बद्र के व्यक्तित्व एवं कृत्तिव पर देश के लगभग 65 साहित्यकारों द्वारा लेखों पर आधारित पुस्तक “बशीर बद्र सदी का मकबूल शायर’ का विमोचन मुख्यअतिथियों द्वारा किया गया। यह कार्यक्रम अंजुमन तरक्की उर्दू हिन्द, शुखबू एजूकेशनल एण्ड कल्चरल सोसायटी और इदारा बाब-ए-इल्म पब्लिकेशन के संयुक्त आयोजन में ‘एक शाम प‌द्मश्री बशीर बद्र के नाम में सर्वप्रथम श्री कारी मो. तैयब अंसारी ने कुरआन की आयत पढ़कर कार्यक्रम को शुरू किया और मकतब उमर इब्ने खत्ताब शहीद नगर भोपाल के उस्ताद कारी साजिद शैख अपने छात्रों द्वारा बशीर बद्र के एक तराना प्रस्तुत किया जिनमें मोहम्मद अरहान खान, सिकंदर शैख, मो. उजैफा शेख, मो. साद, मो. रेहान ने गाया। दिल्ली का मशहूर उर्दू पत्रिका फिक्रो आबही का विशेष अंक प्रकाशित किया जा रहा है जिसकी सम्पादक भोपाल की मशहूर वरिष्ठ लेखिका डॉ. रज़िया हामिद हैं। इकबाल मसूद ने अपने उद्‌बोधन में कहा कि ‘बशीर बद्र ने गजल के चशमे खुशआब में ख्याल का सुरमा लगाकर उसे लायके दीद बना दिया है उनका एहसासे दिल अक्स दर आईना और दिमाग, चिराग आसा है जिसकी लौ में ख्याल का चेहरा चमचमा उठता है। बशीर बद्र की शायरी आपसे बार-बार पढ़े जाने और सुनाये जाने की ज़िद करती है। कराईत से इसका लुत्फ दो चंद हो जाता है इनकी गजलें गोया नो दर्याफ्त जजीरे हैं मौज दर मौज ठाठे मारता समन्दर साहिल के बोसे लेता और एहसास को तजसीम करता है जो एक बड़ी पैंटिंग की तरह एहसासो जमाल से दाद वसूल करती है’ अशोक मिजाज बद्र ने अपने उदबोधन में बशीर बद्र ने गजल की जुबान को सलीस जुबान दी और नये नये तजुर्बे करके गजल को नया मुकाम दिया जो जदीद गज़ल के नाम से आज दुनिया भर में जानी जा रही है। आगे डॉ बशीर बद्र के कलाम पर डॉ. मेहताब आलम ने अपने वक्तव्य रखे तहजीबे सुखन का ताजदार डॉ. बशीर बद्र उर्दू शायरी का वो लिविंग लीजेन्ड हैं जिसके जिक्र के बगैर आजादी के बाद की उर्दू शायरी की तारीख नामुकम्मल है, उर्दू दुनियां में कोई दिन ऐसा नहीं गुज़रता जब डॉ. बशीर बद्र को मुस्तनद हवालों से कोड न कोई जाता हो, डॉ. बशीर बद्र ने अपनी जदीद उर्दू शायरी से अहले हुनरको मुताब्ज्जह करने के साथ उर्दू शायरी के डिक्शन को ही बदल दिया है, यही वजह है के आज के अहद के शोरा उनकी तकलीद को बाईसे फख समझते हैं। कार्यक्रम की अध्यक्षता सीनियर साहित्यकार एवं इलेक्शन कमिश्नर मध्यप्रदेश श्री मनोज श्रीवास्तव ने की। इस कार्यक्रम में डॉ. ज़की तारिक-गाजियाबाद मुख्य अतिथि थे। वक्ताओं में डॉ. नोमान खाँ-भोपाल, श्री इकबाल मसूद-भोपाल, डॉ. अंजुम बाराबंकवी-भोपाल, श्री अशोक मिज़ाज बद-सागर, डॉ. मेहताब आलम-भोपाल ने डॉ. बशीर बद्र एवं पुस्तक पर अपने विचार रखे। कार्यक्रम का संचालन श्री मेहमूद मलिक ने किया। दूसरे सत्र में श्री बशीर बद्र के गजलों के मिसरों पर आधारित रिश्ते होते हैं शायरी की तरहा, ‘आंखों में रहा दिल में उतरकर नहीं देखा’ तरही मुशायरा भी आयोजित किया गया जिराकी अध्यक्षता भोपाल के वरिष्ठ शायर जफर सहबाई ने की मुशायरे का संचालन युवा शायर संचालक शोएब अली खा शाद ने किया।

बशीर बद्र की गज़लों की जमीन में भोपाल के शायर एवं शायरात ने अपनी अपनी तरही गज़लें पेश कीं सारी यादें हैं नक़्श इस दिल पर/हो गया दिल भी शायरी की तरह ज़फ्र सहबाई, मंज़र तो बहुत देखे ये मंज़र नहीं देखा/तुम जैसा कोई चेहरा मुनव्वर नहीं देखा फारूक अंजुम, अब तो सूरज भी मुझको लगता है/ एक मजबूर आदमी की तरह डॉ. अंजुम बाराबंकवी, उसकी जुलफे सियाह शब लेकिन / उसकी यादें हैं चांदनी की तरह डॉ. जकी तारिक, घर मुझे अब अज़ीज लगने लगा/इक मुसाफिर की वापसी की तरह अशोक मिज़ाज बद्र, आंखों ने कभी नींद से मोहलत नहीं मांगी / ख्वाबों ने कभी वक़्ते मुकर्र नहीं देखा-काज़ी मलिक नवेद, इक अनुबंध करते हम दोनो / दस्तखत होते नोटरी की तरह साजिद प्रेमी, यह अश्के निदामत है, भडकते हुए शोलों/कतरे में छुपा तुमने समंदर नहीं देखा सरवर हबीब, देखा तो मगर उसने नज़र भर नहीं देखा/अफसोस मिरी सम्त सुकरर्र नहीं देखा-शोएब अली खां 'शाद', बुनियाद हिलाने की मेरी जिद पर अड़े हो/क्या तुमने मिरी नीव का पत्थर नहीं देखा रूपाली सक्सेना 'गजल', देख तो कई बार मगर हाए रे अफसोस उस शख्स को हमने कभी खुलकर नहीं देखा-अज़ीम असर, आंखों में मेरी प्यार का मंज़र नहीं देखा/उसने मेरी बाहों में सिमट कर नहीं देखा-कमलेश नूर, आंखों से बड़ा कोई समन्दर नहीं देखा/गेहरा था बहुत, डूब के अंदर नहीं देखा अभिलाषा अनुभूति, गजलों के सहारे से. मोहब्बत तो सिखा दे/ इस "बद्र" सा कोई भी सुखनवर नहीं देखा उमेश मिश्रा, पास जाँऊ तो किसके पास मगर/वो भी चुभता है जिन्दगी की तरह एस.एम. मुबश्शिर, धूप में रक्स करती परछाई/चल रही है. किसी सखी की तरह आदिल इमाद। हम वजन न हो में तो इह जाएंगे। रिश्ते

डॉ. रजिया हामिद ने डॉ. बशीर बद्र को चाहने वाले एवं साहित्यकारों एवं शायरों और प्रेस से पधारे पत्रकार एवं छायाकारों का आभार व्यक्त किया ।

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