“बीजिंग में शक्ति प्रदर्शन: पुतिन, शी और मोदी की नई कूटनीतिक चाल, अमेरिका की बढ़ी चिंता”

बीजिंग। अंतरराष्ट्रीय राजनीति के समीकरण एक बार फिर बदलते नज़र आ रहे हैं। चीन की राजधानी बीजिंग इस समय दुनिया की सबसे बड़ी कूटनीतिक गतिविधियों का केंद्र बनी हुई है। यहाँ आयोजित हो रहा है शंघाई सहयोग संगठन (SCO) शिखर सम्मेलन, जिसमें रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन, चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग और भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी समेत 20 से अधिक देशों के शीर्ष नेता हिस्सा ले रहे हैं।

पश्चिमी देशों की चिंता बढ़ी
बीजिंग में हो रहा यह सम्मेलन ऐसे समय में आयोजित हो रहा है जब रूस-यूक्रेन युद्ध थमने का नाम नहीं ले रहा, अमेरिका और यूरोप रूस पर नए प्रतिबंधों की तैयारी कर रहे हैं, और चीन-ताइवान विवाद लगातार गहराता जा रहा है। ऐसे में पुतिन और शी का एक मंच पर आना, और उसमें भारत जैसे बड़े लोकतंत्र की मौजूदगी, अमेरिका के लिए एक बड़ा संदेश है।

क्यों महत्वपूर्ण है यह बैठक?

  • रूस और चीन, दोनों ही पश्चिमी देशों से बढ़ते दबाव के बीच आर्थिक और सुरक्षा साझेदारी को मजबूत कर रहे हैं।
  • भारत, जो अमेरिका का रणनीतिक साझेदार माना जाता है, लेकिन तेल खरीद और रक्षा समझौतों में रूस के साथ भी खड़ा है।
  • SCO अब सिर्फ क्षेत्रीय संगठन नहीं रहा, बल्कि यह पश्चिम के दबाव के विकल्प के रूप में उभरता गठबंधन माना जा रहा है।

बीजिंग में दिखा शक्ति प्रदर्शन
पुतिन, शी और किम जोंग उन (उत्तर कोरिया के नेता) ने एक सैन्य परेड में भाग लिया, जिसे विशेषज्ञों ने ‘नया शक्ति प्रदर्शन’ बताया। इसमें हाइपरसोनिक मिसाइलों और आधुनिक हथियारों का प्रदर्शन किया गया। यह परेड चीन की ओर से पश्चिमी देशों को एक स्पष्ट संदेश माना जा रहा है कि एशिया में उसका दबदबा कायम है।

भारत की भूमिका पर सबकी नज़र
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की चीन यात्रा पिछले सात वर्षों में पहली है। यह ऐसे समय हो रही है जब भारत और चीन के बीच सीमा विवाद अब भी सुलझा नहीं है। लेकिन इस सम्मेलन में भारत की उपस्थिति कई मायनों में महत्वपूर्ण है:

  • ऊर्जा सुरक्षा: भारत रूस से कच्चा तेल खरीद रहा है और यह साझेदारी भारत के लिए आर्थिक रूप से फायदेमंद है।
  • वैश्विक दक्षिण में नेतृत्व: भारत G-20 की सफलता के बाद खुद को विकासशील देशों के नेता के रूप में स्थापित करना चाहता है।
  • संतुलन की नीति: भारत न तो पूरी तरह अमेरिका के पक्ष में जाना चाहता है, न पूरी तरह चीन-रूस खेमे में।

अमेरिका की बढ़ी चिंता
अमेरिका और यूरोप इस पूरे घटनाक्रम पर कड़ी नजर रखे हुए हैं। हाल ही में कीव (यूक्रेन) पर रूस के बड़े मिसाइल हमले ने नाटो देशों की चिंता और बढ़ा दी है। विशेषज्ञों का कहना है कि अगर रूस, चीन और उत्तर कोरिया के बीच यह रणनीतिक साझेदारी और गहरी होती है, तो यह नए शीत युद्ध (New Cold War) की शुरुआत साबित हो सकती है।

आगे क्या?

  • रूस-यूक्रेन युद्ध में कोई ठोस समाधान निकलता नहीं दिख रहा।
  • ताइवान मुद्दे पर अमेरिका और चीन के बीच तनाव और बढ़ सकता है।
  • भारत की नीति यह तय करेगी कि एशिया में शक्ति संतुलन किस दिशा में जाएगा।

विशेषज्ञों की राय
कूटनीति विशेषज्ञों का मानना है कि यह सम्मेलन सिर्फ फोटो-ऑप नहीं है, बल्कि इसमें ऐसे आर्थिक और सुरक्षा समझौते हो सकते हैं, जो आने वाले दशक में वैश्विक राजनीति का चेहरा बदल देंगे।

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