
नर्मदा घाटी में ‘नर्मदा बचाओ मानव बचाओ’ के नजरिये और उद्देश्य के साथ चले अहिंसक, सत्याग्रही आंदोलन के अब 40 साल पूरे हो जाने हैं| सरदार सरोवर के मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, गुजरात के 3 राज्यों के किसान, मजदूर, मछुआरे, पशुपालक, वनोपज पर जीने वाले आदिवासी, व्यापारी, सभी सभी ने महिला शक्ति के साथ अहिंसक मैदानी तथा कानूनी संघर्ष के द्वारा करीबन 50000 परिवारों का पुनर्वास के लिया| लेकिन आज भी कई विस्थापितों का पुनर्वास बाकी है, तथा पुनर्वास स्थलों पर सुविधाओं के अभाव से, पानी, रास्ते, नालियां- निकास, चरागाह, स्वास्थ्य केंद्र जैसे सुविधाएँ अधूरी होते परेशानी है| कुछ हजार परिवार 2019 से या 2023 में डूबग्रस्त होकर भी पुनर्वास कानून (ट्रिब्यूनल फैसला) नर्मदा योजनाओं के लिए घोषित नीति और 2017 तक के आदेशों के अनुसार किसी अधिकार- मकान के लिए भूखंड, वैकल्पिक जमीन का हक, गृह निर्माण के लिए अनुदान से वंचित रखे गये हैं| कई बार चर्चा, प्रस्तुति, आवेदनों के बावजूद, कुछ आश्वासनों के बाद भी निर्णय नहीं दिया जाने से, जिला, संभाग या राज्य स्तर पर प्रलंबित रहने से ऐसे दलित, आदिवासी, मजदूर, विधवा व एकल महिलाएं जैसे विस्थापित अन्याय भुगत रहे है और कई बिना पुनर्वास मौत भी!यह हकीकत सर्वोच्च अदालत के, कुछ उच्च न्यायालय के आदेशों का ही नहीं, मानवी और संवैधानिक अधिकारों का भी उल्लंघन बता रही है| नर्मदा नियंत्रण प्राधिकरण जैसी आंतरराज्य संस्था निष्क्रिय दिखाई देती है जबकि उनके वार्षिक अहवालों में मध्यप्रदेश राज्य स्तरीय ‘नर्मदा घाटी विकास प्राधिकरण’ की ओर से प्राप्त जानकारी के आधार पर पुनर्वास पूरा होकर उर्वरित कार्य (बैलेंस) ‘0’ बताया जा रहा है, यह धक्कादायक है जिसे सर्वोच्च न्यायालय ने भी नकारकर 2017 और 2019 तक आदेश पारित किये है!कई बार ठोस मुद्दों पर चर्चा के बाद भी, सरदार सरोवर प्रभावित 7 तहसीलों में ‘पुनर्वास अधिकारी’ के 7 पद 2 सालों से रिक्त क्यों रखे गये हैं? पुनर्वास का भार अनुविभागीय अधिकारियों पर डालकर, कार्य क्यों धीमा किया या ठप्प सा रखा गया है? सर्वोच्च अदालत के आदेश से गठित शिकायत निवारण प्राधिकरण के 5 सदस्यों के पद सितंबर 2024 से रिक्त रखकर, करीबन 7000 शिकायते- प्रकरण प्रलंबित होते हुए भी, भूतपूर्व न्यायाधीशों की नियुक्ति क्यों नहीं की जा रही है? इन सवालों को दुर्लक्षित करना क्या असंवेदना साबित नहीं करती है?सबसे महत्व का मुद्दा यह भी है कि कुछ सालों से मध्यप्रदेश और गुजरात शासन के बीच वित्तीय सहायता (फंडिंग) के मुद्दे पर विवाद जारी होकर मध्यस्थता की प्रक्रिया से भी आज तक निराकरण नहीं हुआ है| जबकि डूबग्रस्त हुई शासकीय भूमी, वनभूमी की भरपाई और सभी विस्थापितों के संपूर्ण पुनर्वास का खर्चा गुजरात ने ही उठाना नर्मदा ट्रिब्यूनल फैसले अनुसार याने कानूनन बंधनकारक है, तब भी क्यों इन मुद्दों पर करीबन 7000 करोड़ से अधिक राशि की मध्यप्रदेश की मांग पूरी नहीं हो पायी है? मध्यप्रदेश राज्य को 192 गांव और धरमपुरी नगर के हजारों परिवार, हजारों हेक्टर डूब क्षेत्र तथा पुनर्वास स्थलों के लिए अर्जित भूमी, हजारों मकान; 2000 से अधिक हेक्टर जंगल सब कुछ सरदार सरोवर के लिए खोने के बाद, करोड़ों रुपयों का पूंजीनिवेश के बाद भी, मध्य प्रदेश शासन को बिजली का एकमात्र अपेक्षित लाभ भी नहीं मिलने से 900+ करोड रुपए की भरपाई क्यों मांगनी पड़ रही है? जबकि सरदार सरोवर की लागत अब अधिकृत रूप से 75000 करोड रुपए की होना जाहिर किया है तो उसमें स्टेच्यू ऑफ यूनिटी और पर्यटन परियोजनाओं का खर्चा शामिल किया गया है; तो पुनर्वास के लिए भुगतान क्यों नहीं है संभव? क्यों टाल रही है गुजरात शासन और मध्यप्रदेश शासन नहीं ले पा रही है अपना हक?आज गुजरात की कच्छ, सौराष्ट्र की जनता हैरान है उन्हें अपेक्षित सिंचाई और पेयजल भी सही तरीके से और मात्रा में उपलब्ध न होने से तो पानी जैसी सुविधा से, आजीविका से वंचित विस्थापित आदिवासी भी रास्ते पर उतरकर टावर पर चढ़कर तथा न्यायालय में पहुंचकर सवाल उठा रहे हैं| बांध के नीचेवास के किसान, मछुआरे, गांव- नगरवासी भी भुगत चुके हैं, 2023 जैसी बांध से अक्षम्य देरी से 15,16 के बदले 17 सितंबर 2023 को छोड़े गये 18 लाख क्यूसेक्स पानी से हुई खेती, मकान, नाव, जाल, भूजल तथा मंदिर- तीर्थ की बर्बादी! 2023 में ही बैकवॉटर क्षेत्र के “डूब से बाहर” घोषित किये गये, पुनर्वास अधूरा छोड़ें हजारों विस्थापित, मध्यप्रदेश के उपरी क्षेत्र के 172 गांव में भी डूब भुगत चुके हैं| इन सबके लिए जरूरी है, ठोस निर्णय, संपूर्ण पुनर्वास का तथा नीचेवास की गुजरात की जनता के लिए पर्याप्त पानी नियममितता से छोडा जाने का! इन सब मुद्दों पर चर्चा विचार के बावजूद, शोध अहवाल भी नजरअंदाज करके क्यों नहीं लिया जा रहा निर्णय, जो तत्काल आवश्यक है?2025 का वर्षाकाल शुरू हो चुका है! बड़वानी, धार, अलीराजपुर, खरगोन जिले की जनता का सवाल है, क्या जलप्रवाह का (उपरी सभी बांधों से छोड़े जाते) नियमन, सरदार सरोवर और उपरी बांधों के गेट्स समय पर खोलकर नर्मदा नियंत्रण प्राधिकरण से नर्मदा घाटी विकास प्राधिकरण तथा गुजरात शासन के साथ समन्वय से किया जाएगा? डूबग्रस्तों का सालों से प्रलंबित पुनर्वास का कार्य समयबद्ध तरीके से पूरा किया जाएगा?
कब तक? जनता के साथ मां नर्मदा को भी अधिकार है जीने का| उसे दूषित करने वाला औद्योगिक प्रदूषण, अवैध खनन शहरों का गंदा सीवेज बिना उपचार का, और अवैध क्रूझ से जल परिवहन रोकना, आज तक कई आदेश, कानून, निर्देशों के बावजूद नहीं हो रहा है! क्या नर्मदा का पूजन, महोत्सव परिक्रमा करने वाले नर्मदा भक्तों को भी इसे दुर्लक्षित करना और नदी माता पर गंभीर आघात से जन जीवन, स्वास्थ्य पर भी आघात होना मंजूर है?नर्मदा बचाओ आंदोलन 40 साल पूर्ति के बाद भी "नर्मदा बचाओ| मानव बचाओ|" का संकल्प जारी रखेगा जरूर!
भगवान सेप्टा, हेमेंद्र मण्डलोई, मेधा पाटकर
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