भारतवर्ष की महान एवं गौरवशाली संस्कृति को समय-समय पर अनेक महापुरुषों ने अपने चिंतन और दर्शन से समृद्ध किया है। ऐसे ही एक महान व्यक्तित्व पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी थे, जिन्होंने अपना संपूर्ण जीवन मानव सेवा, समाज सेवा और राष्ट्र सेवा के लिए समर्पित कर दिया।पंडित दीनदयाल उपाध्याय आधुनिक भारत के संत तुल्य विचारक, दार्शनिक, राजनेता और राष्ट्रवादी चिंतक थे। उनका प्रस्तुत किया गया एकात्म मानववाद भारतीय समाज और संस्कृति के अनुरूप एक समग्र एवं संतुलित जीवन-दर्शन है। यह दर्शन व्यक्ति, समाज, प्रकृति और ईश्वर के बीच एकात्मता और समन्वय पर आधारित है।उनका मानना था कि पूँजीवाद और साम्यवाद जैसी पाश्चात्य विचारधाराएँ भारतीय समाज के अनुरूप नहीं हैं। उन्होंने शरीर, मन, बुद्धि और आत्मा के संतुलित विकास की आवश्यकता पर बल दिया। वसुधैव कुटुम्बकम की भावना से ओत-प्रोत उनका दर्शन आज भी विश्व मानवता के लिए मार्गदर्शक है।पंडित उपाध्याय ने राजनीति को नैतिकता, सेवा भावना और सांस्कृतिक चेतना से जोड़ने का प्रयास किया। उनके अनुसार राष्ट्र केवल भूमि और जनसंख्या का समूह नहीं, बल्कि एक जीवंत आत्मा है जिसकी आत्मा भारतीय संस्कृति में निहित है। राजनीति में उन्होंने सेवा, त्याग और सदाचार को प्राथमिकता दी।आज जब भारत आत्मनिर्भरता और विकसित राष्ट्र की दिशा में आगे बढ़ रहा है, तब पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी का राजनीतिक और दार्शनिक चिंतन और भी अधिक प्रासंगिक हो जाता है।