अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय मंच पर अपनी मध्यस्थता की भूमिका को रेखांकित करते हुए वैश्विक राजनीति में सुर्खियां बटोरी हैं। इस बार उनके निशाने पर ईरान और इजरायल के बीच बढ़ता तनाव रहा। ट्रंप ने दोनों देशों से अपील की है कि वे संयम बरतें और युद्ध की राह छोड़कर एक समझौते की ओर बढ़ें।ट्रंप ने यह बयान अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म “ट्रूथ सोशल” पर साझा किया, जिसमें उन्होंने लिखा, “ईरान और इजरायल को एक सौदा करना चाहिए, और वे सौदा करेंगे, ठीक वैसे ही जैसे मैंने भारत और पाकिस्तान को करने के लिए कहा।” उन्होंने यह भी जोड़ा कि अमेरिका ने व्यापार के ज़रिए भारत-पाक संबंधों में संतुलन, सामंजस्य और विवेक लाने की कोशिश की थी।हालांकि ट्रंप की यह अपील ऐसे समय आई है जब कुछ ही घंटों पहले उन्होंने ईरान को चेतावनी दी थी कि यदि उसने अमेरिका या उसके सहयोगियों पर हमला किया तो अमेरिकी सेनाएं पूरी ताकत से जवाब देंगी। यह विरोधाभास उनके बयानों में स्पष्ट दिखाई देता है — एक ओर वे शांति की बात करते हैं, वहीं दूसरी ओर सैन्य शक्ति की धमकी भी देते हैं।

यह पहली बार नहीं है जब ट्रंप ने इस प्रकार की मध्यस्थता की बात की हो। अपने राष्ट्रपति काल के दौरान भी उन्होंने भारत और पाकिस्तान के बीच कश्मीर मुद्दे पर मध्यस्थता की पेशकश की थी, जिसे भारत ने तत्काल खारिज कर दिया था। इसके अलावा रूस-यूक्रेन युद्ध के संदर्भ में भी उन्होंने खुद को 'शांतिदूत' की भूमिका में प्रस्तुत करने की कोशिश की थी।विश्लेषकों का मानना है कि ट्रंप की ये 2024 के अमेरिकी राष्ट्रपति चुनावों के बाद भी उनके राजनीतिक एजेंडे का हिस्सा बनी हुई हैं। वे अभी भी खुद को एक वैश्विक समस्या-समाधानकर्ता के रूप में पेश करना चाहते हैं, हालांकि उनके बयानों में स्पष्टता और निरंतरता की कमी कई बार उनकी छवि को नुकसान पहुंचाती है।इजरायल और ईरान के बीच हालिया तनाव, खासकर गाजा पट्टी, सीरिया और लेबनान सीमा क्षेत्रों में बढ़ते संघर्षों के बीच, अंतरराष्ट्रीय समुदाय पहले ही मध्यस्थता और कूटनीतिक हस्तक्षेप की कोशिश कर रहा है। ऐसे में ट्रंप का यह बयान शायद उनकी राजनीतिक महत्वाकांक्षा और वैश्विक प्रभाव कायम रखने की कोशिश के रूप में देखा जा सकता है।