ईरान और इजरायल के बीच चल रहे सशस्त्र संघर्ष को एक सप्ताह से अधिक समय बीत चुका है, लेकिन अमेरिका अब तक इस जटिल स्थिति में हस्तक्षेप करने को लेकर दुविधा में है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अभी तक यह स्पष्ट नहीं किया है कि अमेरिका इस युद्ध में प्रत्यक्ष रूप से शामिल होगा या नहीं। वाइट हाउस की ओर से जारी एक बयान में कहा गया है कि राष्ट्रपति इस संबंध में आगामी दो सप्ताह के भीतर कोई निर्णय ले सकते हैं।

फैसले में देरी के पीछे डर और इतिहास
सूत्रों के अनुसार, राष्ट्रपति ट्रंप की असमंजस की स्थिति का मूल कारण मध्य-पूर्व में अमेरिका के पूर्व के हस्तक्षेपों से जुड़ा है। न्यूयॉर्क पोस्ट की एक रिपोर्ट के मुताबिक, राष्ट्रपति ट्रंप को डर है कि यदि अमेरिका ईरान के सर्वोच्च नेता अली खामेनेई के खिलाफ किसी भी तरह की कार्रवाई करता है, तो स्थिति ‘एक और लीबिया’ में बदल सकती है।ट्रंप प्रशासन के तीन उच्च-स्तरीय सूत्रों ने खुलासा किया है कि राष्ट्रपति ने हाल के बैठकों में बार-बार 2011 के लीबिया अभियान का उल्लेख किया है, जब अमेरिका ने NATO के साथ मिलकर लीबिया के शासक मुअम्मर गद्दाफी को सत्ता से हटाने में अहम भूमिका निभाई थी। गद्दाफी की सत्ता से बेदखली के बाद लीबिया में राजनीतिक अस्थिरता, गृह युद्ध और आतंकवादी गतिविधियों में अभूतपूर्व वृद्धि हुई थी, जिससे देश एक 'फेल स्टेट' (असफल राष्ट्र) में तब्दील हो गया।
ईरान की तुलना लीबिया से क्यों?
राष्ट्रपति ट्रंप के निकट सूत्रों का कहना है कि ट्रंप यह मानते हैं कि ईरान में यदि सत्ता परिवर्तन अस्थिर और बिना किसी स्पष्ट योजना के किया गया, तो वहां भी अराजकता फैल सकती है। राष्ट्रपति की यह आशंका है कि यदि खामेनेई को हटाया गया, तो ईरान में कट्टरपंथी गुटों और आतंकवादी संगठनों को पनपने का अवसर मिल सकता है, जो पूरे पश्चिम एशिया में अस्थिरता का कारण बन सकते हैं।राष्ट्रपति ट्रंप का यह रुख उनके ‘अमेरिका फर्स्ट’ दृष्टिकोण से भी मेल खाता है, जिसमें वे बाहरी युद्धों में अनावश्यक हस्तक्षेप के बजाय घरेलू हितों की प्राथमिकता को महत्व देते हैं।
वाइट हाउस का बयान
वाइट हाउस के प्रवक्ता ने पुष्टि की है कि राष्ट्रपति अंतरराष्ट्रीय और घरेलू सलाहकारों से व्यापक विचार-विमर्श कर रहे हैं और स्थिति पर लगातार नजर बनाए हुए हैं। बयान में कहा गया है, “राष्ट्रपति ट्रंप मानते हैं कि किसी भी सैन्य निर्णय का प्रभाव क्षेत्रीय और वैश्विक स्थिरता पर पड़ता है। अतः वह कोई भी कदम सोच-समझकर और राष्ट्रहित में ही उठाएंगे।”