ईरान–अमेरिका टकराव में रूस और चीन की भूमिका पर चर्चा तेज,

28 फरवरी को अमेरिका और इजरायल द्वारा ईरान पर किए गए हमलों के बाद पश्चिम एशिया में तनाव लगातार बढ़ता जा रहा है। इसके जवाब में ईरान ने अमेरिका और इजरायल के साथ-साथ पूरी दुनिया को चौंकाते हुए जवाबी कार्रवाई की है। ईरानी मिसाइलों ने इजरायल के कई क्षेत्रों में भारी नुकसान पहुंचाया है, वहीं खाड़ी देशों में स्थित अमेरिकी सैन्य ठिकानों को भी निशाना बनाया गया है। ईरान के इन सटीक हमलों के पीछे रूस और चीन से मिली रणनीतिक और खुफिया मदद को अहम माना जा रहा है। रिपोर्ट में तीन वरिष्ठ अमेरिकी अधिकारियों के हवाले से बताया गया है कि रूस ने ईरान को पश्चिम एशिया में तैनात अमेरिकी युद्धपोतों और विमानों की लोकेशन सहित संवेदनशील खुफिया जानकारी उपलब्ध कराई है। आधुनिक युद्ध में रडार, सैटेलाइट फीड और एन्क्रिप्टेड कोऑर्डिनेट्स की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती है।विशेषज्ञों का मानना है कि रूस की इस खुफिया मदद ने ईरान को अमेरिकी और इजरायली सैन्य संसाधनों का सटीक पता लगाने में बड़ी बढ़त दी है। सीआईए के पूर्व अधिकारी ब्रूस रीडेल के अनुसार आधुनिक युद्ध में सटीक कोऑर्डिनेट्स ही जीत और हार का फैसला करते हैं। यदि किसी देश को दुश्मन की सही स्थिति का पता हो, तो उसके लिए हमला करना आसान हो जाता है।बताया जाता है कि ईरान के पास सैन्य टोही सैटेलाइट की संख्या सीमित है, जिससे खुले समुद्र में मौजूद नौसैनिक संपत्तियों पर निगरानी रखना कठिन होता है। इसके विपरीत रूस के पास उन्नत हवाई निगरानी नेटवर्क है, जो ईरान को ऑप्टिकल और रडार इमेजरी उपलब्ध करा रहा है। कुवैत में अमेरिकी सैन्य ठिकाने पर ईरान के सटीक ड्रोन हमले को भी इसी सहयोग का उदाहरण माना जा रहा है, जिसमें छह अमेरिकी सैनिकों की मौत हुई थी।विशेषज्ञों का कहना है कि रूस और चीन ने ईरान की मदद के लिए अपनी सैन्य टुकड़ियां नहीं भेजी हैं, लेकिन तकनीकी और खुफिया सहयोग के माध्यम से वे ईरान को युद्ध में रणनीतिक बढ़त दिलाने की कोशिश कर रहे हैं। माना जा रहा है कि इस सहयोग से खाड़ी क्षेत्र में शक्ति संतुलन पर भी असर पड़ सकता है।

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