
इटावा में कुछ दिन पूर्व यादव जाति के कथावाचक के साथ जातिगत आधार पर की गई हिंसा का मुद्दा दलित पिछड़ा समाज संगठन DPSS द्वारा आयोजित युवा संवाद कार्यक्रम में छाया रहा। मुख्य अतिथि के रूप में मौजूदा संगठन के संस्थापक दामोदर सिंह यादव ने कहा कि जो धर्म जाति वर्ग के आधार पर छोटा-बड़ा बनाता है, वह कैसे स्वीकार्य होगा? बाबा साहब डॉ. अंबेडकर पैदा हुए थे हिंदू धर्म में लेकिन उन्होंने भी इन्हीं कारणों से दुखी होकर हिंदू धर्म छोड़कर बौद्ध धर्म अपनाया था। हमारी लड़ाई आउंबर और धर्म के ठेकेदारों से है न कि ईश्वरीय सत्ता से। हम किसी का एकाधिकार नहीं चलने देंगे और इसीलिए मनुस्मृति का विरोध कर रहे हैं क्योंकि वही सारी फसाद की जड़ है।यादव ने कहा कि पहले एस.सी. वर्ग का शोषण करके उन्हें हिंदू धर्म से अलग होने के लिए विवश किया गया और अब पिछड़ों के साथ भी वही कोशिश हो रही है। कहीं यादव कथा वाचक के साथ घ्रणित घटना, तो कहीं पटेल महिला कथावाचक का अपमान, कहीं लोधी को मल खिलाने की घटना, तो कहीं घोडी चढ़ने पर दलित के साथ मारपीट होती है। बुंदेलखंड में तो सामंतियों ने पाल समाज की बहू-बेटियों को ही किडनैप कर लिया। क्या वास्तव में यही हिंदू धर्म है? छात्र नेता सौरभ यादव ने कहा कि आज जब युवा रोजगार मांगते हैं तो उन्हें पकौड़ा तलने की सलाह दी जाती है या फिर राष्ट्रवाद और धर्म में उलझा दिया जाता है और कांग्रेस सामाजिक न्याय के नाम पर सिर्फ जातिगत जनगणना का राग अलापती रहती है, जबकि खुद के शासन काल में खुद पिछड़ों के साथ बेईमानी की। इस युवा संवाद कार्यक्रम का उद्देश्य ही यही है कि युवाओं को राजनैतिक, शैक्षिक, सामाजिक रूप से जागरूक किया जा सके जिससे अब अपने हक अधिकार के लिए लड़ सकें।

विशिष्ट अतिथि के रूप में मौजूद DPSS के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष बलबहादुर बघेल ने कहा कि ग्वालियर हाईकोर्ट परिसर में बाबा साहब अंबेडकर की स्टेचू हमारे साथी लगाना चाहते हैं लेकिन मुहीमर मनुवादी वकील विरोध कर रहे है, यह देश बाबा साहब द्वारा लिखित संविधान से चलेगा न कि मनुविधान से। कार्यक्रम की अध्यक्षता DPSS के राष्ट्रीय सचिव हुकुमचंद गहलोत ने की एवं संचालन प्रदेश महासचिव कमल सिंह कुशवाह ने किया। इस अवसर पर अमित बंसोड़, सुनीता धावरे, राजकुमार प्रजापति, राय आशीष, प्रियेश यादव, सुरेश कुशवाह ने भी विचार व्यक्त किये। संवाद कार्यक्रम के पश्चात पैदल मार्च करते हुए सभी कार्यकर्ता महात्मा फुले चौराहे पर पहुंचे जहाँ विरोधात्मक रूप से मनुस्मृति दहन किया।