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तीस्ता परियोजना पर भारत, चीन और अमेरिका की नजर, बांग्लादेश के सामने बढ़ी कूटनीतिक चुनौती,

बांग्लादेश की तीस्ता नदी परियोजना अब केवल सिंचाई और बाढ़ नियंत्रण तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि यह भारत, चीन और अमेरिका के बीच बढ़ती रणनीतिक दिलचस्पी का केंद्र बनती जा रही है। पहले से ही भारत और बांग्लादेश के बीच तीस्ता नदी के जल बंटवारे को लेकर मतभेद रहे हैं। वहीं, परियोजना में चीन की वित्तीय भागीदारी और अब अमेरिका की बढ़ती दिलचस्पी ने इस मुद्दे को अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के लिहाज से और महत्वपूर्ण बना दिया है।30 अगस्त को बांग्लादेश में अमेरिकी राजदूत ब्रेंट क्रिस्टेंसन के तीस्ता बैराज और लालमोनिरहाट क्षेत्र के दौरे के बाद इस परियोजना को लेकर नई चर्चाएं शुरू हुईं। राजदूत ने अपने दौरे के दौरान केवल नदी और बैराज से जुड़ी गतिविधियों को ही नहीं देखा, बल्कि क्षेत्र के प्रमुख आर्थिक संस्थानों का भी दौरा किया। इनमें रंगपुर के गंगाचारा उपजिला स्थित पैरागॉन डेयरी, पंचगढ़ की ग्रीन फील्ड टी इंडस्ट्रीज लिमिटेड और परबतीपुर स्थित केंद्रीय रेलवे वर्कशॉप शामिल हैं। इस दौरे में उनके साथ वरिष्ठ आर्थिक और राजनीतिक अधिकारियों का प्रतिनिधिमंडल भी मौजूद था।विशेषज्ञों के बीच यह चर्चा है कि अमेरिकी राजदूत का दौरा बांग्लादेश के साथ अमेरिका के आर्थिक और व्यापारिक संबंधों में बढ़ती सक्रियता से जुड़ा हो सकता है। अमेरिकी कंपनियों की बांग्लादेश के बड़े बुनियादी ढांचा परियोजनाओं में संभावित भागीदारी को लेकर भी दिलचस्पी जताई जा रही है। हालांकि, तीस्ता परियोजना में अमेरिका की औपचारिक भागीदारी या निवेश को लेकर किसी अंतिम निर्णय की पुष्टि आवश्यक है।

तीस्ता परियोजना पर क्यों है तीनों देशों की नजर

बांग्लादेश की तीस्ता परियोजना की अनुमानित लागत करीब एक अरब डॉलर बताई जाती है। इस परियोजना का उद्देश्य सिंचाई व्यवस्था को बेहतर बनाना, बाढ़ के प्रभाव को कम करना और नदी क्षेत्र के विकास को बढ़ावा देना है। लेकिन नदी की भौगोलिक स्थिति और पानी के प्रवाह से जुड़ी चुनौतियां इस योजना को जटिल बनाती हैं।तीस्ता नदी हिमालयी क्षेत्र से निकलकर सिक्किम और पश्चिम बंगाल से होते हुए बांग्लादेश में प्रवेश करती है। अंततः यह कुरीग्राम जिले के चिलमारी के पास जमुना नदी में मिल जाती है। तेज बहाव, मौसमी जलस्तर में बदलाव, भारी मात्रा में तलछट और अचानक आने वाली बाढ़ इस नदी की प्रमुख विशेषताएं हैं।भारत में तीस्ता और इसकी सहायक नदियों पर कई जलविद्युत परियोजनाएं विकसित की गई हैं। दूसरी ओर, बांग्लादेश लंबे समय से तीस्ता के पानी का बेहतर उपयोग सिंचाई और कृषि के लिए करना चाहता है। ऐसे में नदी के जल बंटवारे, बैराजों के संचालन और दोनों देशों के किसानों की जरूरतों के बीच संतुलन बनाना बेहद जरूरी है।

चीन से ऋण लेने के बाद बढ़ीं चुनौतियां

बांग्लादेश ने तीस्ता परियोजना के लिए चीन के एक्जिम बैंक से व्यावसायिक शर्तों पर लगभग एक अरब डॉलर के ऋण की व्यवस्था की थी। हालांकि, परियोजना के वित्तपोषण के साथ-साथ इसे जमीन पर लागू करने में भी कई तकनीकी और भौगोलिक चुनौतियां सामने आती हैं।तीस्ता नदी कई स्थानों पर अपना मार्ग बदलती है और अलग-अलग धाराओं में बंट जाती है। इसकी चौड़ाई भी हर जगह एक जैसी नहीं है। कहीं नदी का विस्तार लगभग तीन किलोमीटर तक हो जाता है, तो कहीं यह करीब 700 मीटर तक सीमित रह जाती है। नदी में लगातार होने वाले बदलाव और तलछट का जमाव किसी भी बड़े निर्माण और जल प्रबंधन योजना को कठिन बना सकते हैं।ऐसे में केवल बड़े निवेश या आधुनिक तकनीक के सहारे इस समस्या का समाधान निकालना आसान नहीं होगा। परियोजना की सफलता के लिए नदी के प्राकृतिक व्यवहार को समझना, स्थानीय परिस्थितियों का अध्ययन करना और दीर्घकालिक जल प्रबंधन योजना तैयार करना आवश्यक है।

भारत की भूमिका क्यों अहम है?

तीस्ता नदी का ऊपरी हिस्सा भारत में होने के कारण इसके जल प्रवाह पर भारत की भौगोलिक और बुनियादी ढांचा संबंधी स्थिति का महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ता है। पश्चिम बंगाल में गजोल्डोबा और बांग्लादेश में डालिया बैराज नदी के जल प्रबंधन में अहम भूमिका निभाते हैं।मानसून के दौरान भारी बारिश और अचानक बाढ़ की स्थिति में दोनों देशों को जल प्रवाह का प्रबंधन करना पड़ता है। यदि पानी के बंटवारे और बैराजों के संचालन को लेकर बेहतर तालमेल नहीं बनता, तो इसका असर बांग्लादेश के कृषि क्षेत्रों, स्थानीय आबादी और नदी के पारिस्थितिकी तंत्र पर पड़ सकता है।इसी वजह से तीस्ता परियोजना को केवल आर्थिक निवेश के नजरिये से देखना पर्याप्त नहीं है। भारत और बांग्लादेश के बीच संवाद, तकनीकी सहयोग और जल बंटवारे पर सहमति इस परियोजना के भविष्य के लिए महत्वपूर्ण होगी।

अमेरिका की दिलचस्पी से बढ़ेगी कूटनीतिक जटिलता?

एशियन ग्रोथ रिसर्च इंस्टीट्यूट के प्रोफेसर और संयुक्त राष्ट्र में विकास अनुसंधान से जुड़े रहे नजरुल इस्लाम ने बांग्लादेशी समाचार पत्र ‘प्रोथोम आलो’ में तीस्ता परियोजना से जुड़ी भू-राजनीतिक चुनौतियों पर चिंता जताई है। उनके अनुसार, यह परियोजना पहले ही भारत और चीन के बीच रणनीतिक प्रतिस्पर्धा से प्रभावित रही है। ऐसे में अमेरिका की संभावित भागीदारी स्थिति को और जटिल बना सकती है।बांग्लादेश के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वह अपने विकास और कृषि संबंधी हितों को प्राथमिकता देते हुए तीनों देशों के साथ अपने संबंधों में संतुलन कैसे बनाए रखता है। चीन की वित्तीय भागीदारी, भारत की भौगोलिक और जल संबंधी भूमिका तथा अमेरिका की संभावित आर्थिक दिलचस्पी के बीच किसी भी फैसले का असर क्षेत्रीय राजनीति पर पड़ सकता है।

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