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भारत की वायु सुरक्षा को मिलेगा और बल, S-400 का चौथा स्क्वाड्रन जल्द पहुंचेगा,

भारत की वायु रक्षा क्षमता को और मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण प्रगति सामने आई है। रूस द्वारा निर्मित अत्याधुनिक S-400 ट्रायम्फ एयर डिफेंस सिस्टम का चौथा स्क्वाड्रन जल्द ही भारत को सौंपा जा सकता है। जानकारी के अनुसार, इस डिलीवरी को लेकर भारतीय वायुसेना की एक टीम रूस पहुंच चुकी है और सिस्टम का अंतिम परिचालन जारी है। S-400 के चौथे स्क्वाड्रन की डिलीवरी पहले मार्च 2026 में प्रस्तावित थी, लेकिन तकनीकी और वैश्विक परिस्थितियों के चलते इसमें थोड़ी देरी हुई है। अब इसके मई या जून 2026 तक भारत पहुंचने की संभावना जताई जा रही है। परीक्षण सफल रहने पर यह खेप इस वर्ष की दूसरी तिमाही में भारत को सौंप दी जाएगी।इसके साथ ही S-400 मिसाइल सिस्टम का पांचवां और अंतिम स्क्वाड्रन भी वर्ष 2026 की अंतिम तिमाही तक भारत पहुंच सकता है। उल्लेखनीय है कि भारत और रूस के बीच अक्टूबर 2018 में लगभग 5.43 अरब डॉलर की लागत से पांच S-400 सिस्टम खरीदने का समझौता हुआ था, जिसमें से तीन सिस्टम पहले ही भारत को मिल चुके हैं। तीसरे स्क्वाड्रन की डिलीवरी वर्ष 2023 की शुरुआत में की गई थी।हालांकि, रूस-यूक्रेन युद्ध के चलते इस रक्षा सौदे की समयसीमा प्रभावित हुई है, जिससे डिलीवरी में देरी हुई। भारत ने इस मुद्दे को उच्च स्तर पर उठाया है और दोनों देशों के बीच समन्वय के साथ प्रक्रिया को आगे बढ़ाया जा रहा है।S-400 ट्रायम्फ सिस्टम विश्व के सबसे उन्नत वायु रक्षा प्रणालियों में से एक माना जाता है। यह लगभग 400 किलोमीटर तक की दूरी पर दुश्मन के लड़ाकू विमानों, बैलिस्टिक मिसाइलों, ड्रोन और यहां तक कि स्टील्थ तकनीक से लैस लक्ष्यों को भी नष्ट करने में सक्षम है। इसकी ट्रैकिंग क्षमता लगभग 600 किलोमीटर तक मानी जाती है, जो इसे रणनीतिक रूप से बेहद प्रभावशाली बनाती है।, S-400 की तैनाती भारत के मल्टी-लेयर एयर डिफेंस सिस्टम को और अधिक मजबूत करेगी, जिससे देश की सीमाओं की सुरक्षा में महत्वपूर्ण बढ़ोतरी होगी। यह प्रणाली विभिन्न रेंज की मिसाइलों के साथ काम करती है, जो अलग-अलग दूरी के लक्ष्यों को सटीकता से निशाना बना सकती हैं।, S-400 सिस्टम ने पूर्व में भी अपनी प्रभावशीलता साबित की है और आधुनिक युद्ध की चुनौतियों से निपटने में यह एक महत्वपूर्ण संपत्ति है।भारत द्वारा अतिरिक्त S-400 सिस्टम खरीदने के प्रस्ताव को भी स्वीकृति मिल चुकी है, जिससे भविष्य में देश की वायु सुरक्षा और अधिक सुदृढ़ होने की उम्मीद है।

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