पाकिस्तान की राजनीति और सत्ता के गलियारों में एक बार फिर सेना का दबदबा बढ़ने के संकेत दिखाई दे रहे हैं। प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ की सरकार 27वें संविधान संशोधन विधेयक को संसद में पेश करने की तैयारी में है, जिसके माध्यम से मौजूदा सेना प्रमुख एवं फील्ड मार्शल असीम मुनीर के कार्यकाल, शक्तियों और संवैधानिक स्थिति को स्पष्ट तथा मजबूत करने का प्रयास किया जा रहा है। इस संशोधन के पारित होते ही पाकिस्तान में सेना प्रमुख की शक्तियां लगभग असीमित हो जाएंगी और देश में उनके अधिकारों को चुनौती देने वाला कोई संवैधानिक तंत्र शेष नहीं रहेगा।पाकिस्तान में पहले से ही सेना का प्रभाव इतना गहरा है कि वहां की राजनीतिक व्यवस्था अक्सर सैन्य नेतृत्व के इशारों पर चलती रही है। देश के इतिहास में प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से सेना का शासन लगभग आधी से अधिक अवधि तक रहा है। ऐसे में, यह संशोधन उस परंपरा को और मजबूत करता प्रतीत हो रहा है।मई 2025 में ऑपरेशन ‘सिंदूर’ के बाद, जब पाकिस्तान को भारत के हाथों सैन्य पराजय का सामना करना पड़ा, तब तत्कालीन सरकार ने असीम मुनीर को सांत्वना के रूप में ‘फील्ड मार्शल’ का पद प्रदान किया था। यह पद पाकिस्तान में ऐतिहासिक रूप से प्रतीकात्मक माना जाता रहा है, न कि सक्रिय प्रशासनिक या सैन्य पद के रूप में। परंतु मौजूदा सरकार इस पद को संवैधानिक मान्यता देने के लिए अनुच्छेद 243 में संशोधन करने जा रही है।अब तक पाकिस्तान के संविधान या सेना अधिनियम में फील्ड मार्शल के कार्यकाल, शक्तियों या सेवा शर्तों का कोई उल्लेख नहीं था। इस संशोधन के बाद न केवल इन पहलुओं को कानूनी सुरक्षा मिल जाएगी, बल्कि असीम मुनीर को संवैधानिक रूप से सर्वोच्च सैन्य अधिकार प्राप्त हो जाएंगे।राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि शहबाज शरीफ सरकार का यह कदम पूरी तरह से सत्ता समीकरणों को सुरक्षित करने की दिशा में है। शरीफ सरकार, जो पहले से ही सेना के समर्थन पर टिकी हुई मानी जाती है, फील्ड मार्शल मुनीर की शक्तियों को संवैधानिक सुरक्षा देकर अपने राजनीतिक भविष्य को भी सुरक्षित करने की कोशिश कर रही है।लेकिन इसके दूरगामी परिणाम पाकिस्तान के लोकतंत्र पर गहरा असर डाल सकते हैं। इस संशोधन के लागू होने के बाद सेना प्रमुख का पद न केवल राजनीतिक रूप से अजेय हो जाएगा, बल्कि किसी भी असहमति या लोकतांत्रिक नियंत्रण को व्यावहारिक रूप से समाप्त कर देगा।

पाकिस्तान के इतिहास में जनरल अयूब खान, जनरल जिया-उल-हक और जनरल परवेज़ मुशर्रफ़ जैसे नेताओं ने यह दिखाया है कि सेना किस तरह से सत्ता पर कब्जा कर सकती है और लंबे समय तक देश चलाती रह सकती है। आज भी पाकिस्तान की आंतरिक नीतियों, विदेश नीति, यहां तक कि मीडिया पर नियंत्रण में भी सेना की भूमिका सबसे प्रमुख है।वर्तमान परिदृश्य में, फील्ड मार्शल असीम मुनीर के पास न केवल सेना की बागडोर है, बल्कि वे राजनीतिक रूप से भी अत्यधिक प्रभावशाली हैं। सूत्रों के अनुसार, उनका इरादा आने वाले वर्षों में फील्ड मार्शल की कुर्सी पर लंबे समय तक बने रहने का है।27वें संविधान संशोधन के पारित होते ही मुनीर को “संवैधानिक ढाल” प्राप्त हो जाएगी — यानी कोई अदालत, संसद या राजनीतिक निकाय उनकी नियुक्ति, कार्यकाल या निर्णयों को चुनौती नहीं दे सकेगा। इस तरह पाकिस्तान में सैन्य नेतृत्व को पहली बार स्पष्ट संवैधानिक संरक्षण मिल जाएगा।कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि यह संशोधन देश की लोकतांत्रिक संरचना को कमजोर कर सकता है। पाकिस्तान के संविधान में पहले से ही सेना को विशेषाधिकार प्राप्त हैं, लेकिन अब यह संशोधन उन शक्तियों को औपचारिक और असीमित बना देगा।कई राजनीतिक विश्लेषकों का यह भी दावा है कि असीम मुनीर खुद को पाकिस्तान का “सुप्रीम कमांडर” बनाने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। वे चाहते हैं कि सेना प्रमुख के पद से आगे बढ़कर फील्ड मार्शल को संविधान के भीतर एक स्थायी संस्थान के रूप में मान्यता दी जाए — जैसा कि कुछ देशों में आजीवन सैन्य नेतृत्व के उदाहरण देखने को मिलते हैं।