जर्मनी ने दूसरे देश में अपने सैनिकों की तैनाती की,दूसरे विश्व युद्ध के बाद पहली बार उठाया है ये कदम,

जर्मनी की रक्षा और भू-राजनीतिक रणनीति में एक बड़ा बदलाव दर्शाती है। दूसरे विश्व युद्ध के बाद पहली बार जर्मनी ने किसी विदेशी धरती पर स्थायी रूप से अपनी सेना की तैनाती का फैसला किया है। यह कदम मुख्य रूप से रूस के बढ़ते खतरे के मद्देनजर उठाया गया है, खासकर यूक्रेन पर रूस के आक्रमण के बाद।

मुख्य बिंदु:

  1. लिथुआनिया में तैनाती – जर्मनी ने 5,000 सैनिकों की एक बख्तरबंद ब्रिगेड लिथुआनिया में तैनात करने का फैसला किया है।
  2. नाटो सहयोग – यह कदम नाटो सहयोगियों के साथ मिलकर यूरोप के पूर्वी हिस्से की सुरक्षा को मजबूत करने के लिए उठाया गया है।
  3. ऐतिहासिक निर्णय – यह लगभग 80 वर्षों में पहली बार है जब जर्मनी ने अपने सैनिकों को विदेश में स्थायी रूप से तैनात किया है।
  4. रूस का खतरा – जर्मनी को लगता है कि रूसी सेना यूक्रेन तक ही सीमित नहीं रहेगी, बल्कि अन्य यूरोपीय देशों तक भी पहुंच सकती है।

महत्व:

यह निर्णय न केवल यूरोप की सुरक्षा को मजबूत करता है, बल्कि जर्मनी की विदेश और रक्षा नीति में एक बड़ा बदलाव भी दिखाता है।यह नाटो की एकजुटता को बढ़ाने और रूस को एक स्पष्ट संदेश देने का प्रयास है कि यूरोपीय देश अपनी सुरक्षा को लेकर गंभीर हैं।यह कदम जर्मनी के पारंपरिक सैन्य रुख से हटकर अधिक सक्रिय भूमिका निभाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण संकेत है।

संक्षेप में, जर्मनी का यह निर्णय यूरोप में भू-राजनीतिक संतुलन को प्रभावित कर सकता है और नाटो की पूर्वी सीमा को और मजबूत कर सकता है।

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