राजधानी भोपाल में ई-रिक्शा का संचालन पूरी तरह से अव्यवस्था का शिकार हो चुका है। कलेक्टर के स्पष्ट निर्देशों के बावजूद 9 महीने बीत जाने के बाद भी ई-रिक्शा के रूट और स्टैंड तय नहीं हो सके हैं। इसका सीधा असर शहर की यातायात व्यवस्था पर पड़ रहा है। सड़कों पर जाम, अव्यवस्थित पार्किंग और दुर्घटनाओं का खतरा लगातार बढ़ता जा रहा है।अब अधिकारी यह कहकर पल्ला झाड़ते नजर आ रहे हैं कि ई-रिक्शा रूट का ड्राफ्ट तैयार कर आरटीओ (RTO) को भेज दिया गया है, जबकि जमीनी हकीकत यह है कि भोपाल की सड़कों पर हालात दिन-ब-दिन बिगड़ते जा रहे हैं।जहां सवारी, वहीं तय रूट और निर्धारित स्टैंड के चल रहे ई-रिक्शा जहां सवारी मिलती है, वहीं अचानक रुक जाते हैं। इससे पीछे चल रहे वाहन चालकों को अचानक ब्रेक लगाना पड़ता है और कुछ ही पलों में लंबा जाम लग जाता है।पुराने भोपाल की तंग गलियों से लेकर नए भोपाल की चौड़ी और व्यस्त सड़कों तक ई-रिक्शा अव्यवस्था की बड़ी वजह बन चुके हैं। पीक ऑवर्स में हालात और भी बदतर हो जाते हैं।कई इलाकों से नाबालिग बच्चों द्वारा ई-रिक्शा चलाए जाने की शिकायतें सामने आ रही हैं। हैरानी की बात यह है कि इन ई-रिक्शा में स्कूली बच्चों को भी ढोया जा रहा है।ना ड्राइविंग लाइसेंस की जांच, ना वाहन की फिटनेस, और ना ही यात्रियों की सुरक्षा के लिए कोई ठोस इंतजाम नजर आता है। हेलमेट, रिफ्लेक्टर, स्पीड कंट्रोल जैसी बुनियादी सुरक्षा व्यवस्थाएं भी अधिकतर ई-रिक्शा में नदारद हैं।

कलेक्टर के निर्देश, लेकिन अमल शून्य
एडिशनल डीसीपी ट्रैफिक संजय सिंह पंवार ने बताया कि ई-रिक्शा रूट का ड्राफ्ट तैयार कर आरटीओ को भेज दिया गया है। आरटीओ द्वारा सेक्टर तय किए जाने के बाद ही अंतिम रूप से रूट का आवंटन किया जाएगा।हालांकि बड़ा सवाल यह है कि जब तक आरटीओ का फैसला नहीं आता, तब तक राजधानी की सड़कों पर फैल रही अव्यवस्था, जाम और हादसों की जिम्मेदारी आखिर किसकी होगी?ई-रिक्शा संचालन को लेकर नीति तो बनाई गई, लेकिन 9 महीने बाद भी वह जमीन पर उतरती नजर नहीं आ रही है। आम नागरिक रोज जाम से जूझ रहे हैं, लेकिन जिम्मेदार विभाग एक-दूसरे पर जिम्मेदारी डालते नजर आ रहे हैं।अब भोपालवासियों की नजर आरटीओ के फैसले पर टिकी है—कि आखिर कब ई-रिक्शा के रूट तय होंगे, कब अव्यवस्था पर लगाम लगेगी और कब राजधानी की सड़कों को जाम से राहत मिलेगी।अप्रैल 2025 को जिला सड़क सुरक्षा समिति की बैठक में कलेक्टर कौशैलेंद्र सिंह ने इलाकेवार ई-रिक्शा रूट तय करने के स्पष्ट निर्देश दिए थे। ट्रैफिक पुलिस और नगर निगम को यह जिम्मेदारी सौंपी गई थी कि वे रूट और स्टैंड चिन्हित कर व्यवस्था लागू करें।लेकिन 9 महीने बीत जाने के बाद भी न तो रूट तय हो पाए और न ही ई-रिक्शा स्टैंड चिन्हित किए जा सके। नतीजा यह है कि आदेश फाइलों में ही सिमट कर रह गए और सड़क पर अव्यवस्था फैलती चली गई।