
महान परंपराओं में एक अत्यंत पावन और चमत्कारी स्थान है — बंदर–चूहा सिद्ध पीठ। 🌿 प्राचीन काल की झलककहा जाता है कि प्राचीन समय में यहाँ विशाल मेला लगता था। दूर-दूर के गाँवों से लोग अनेक दिनों की यात्रा कर इस पावन धाम तक पहुँचते थे। श्रद्धालुओं के कदमों से भूमि पवित्र हो उठती और सभी दिशाओं में भक्ति की अनोखी गूँज फैल जाती थी।समय के परिवर्तन के साथ, परिस्थितियाँ बदलीं और किसी अज्ञात कारणवश यह परंपरा धीरे-धीरे क्षीण होने लगी। देखते-देखते वह बड़ा और प्रसिद्ध मेला अंततः रुक सा गया।परंतु दिव्य शक्ति जिसे चाहती है, उसे पुनर्जीवित कर ही देती है।🌟 पुनर्जीवन का संघर्षइस खोई हुई परंपरा को फिर से जीवित करने का बीड़ा उठाया—हमारे स्वर्गीय श्री हल्की प्रसाद कोसली जी ,और उत्तम कौरेती,रामविकास खुरसंगे,सुखचैन कौरेती नंद कुमार बरकड़े, ग्राम लावेसरा सरपंच कविता वरकड़े , धन्नू लाल उइके कृपाराम,तरुण सलाम, दिनेश कोरेती, भुवनेश्वर गुन्गे,उन्होंने अथक परिश्रम, अटूट विश्वास और अटूट भक्ति के साथ इस मेले की प्राचीन महिमा को पुनः स्थापित किया। उनके प्रयासों से पिछले वर्ष यह मेला फिर से आरम्भ हुआ। ऐसा कहा जाता है कि जब संकल्प में धर्म और भक्ति का मिलन होता है, तो असंभव भी संभव हो जाता है।
💧 अद्भुत झरने का रहस्य
इस पवित्र स्थल की पहचान उस अद्भुत झरने से भी है, जो युगों से निर्झर रूप से बहता आ रहा है। कहा जाता है कि यहाँ का पानी कभी समाप्त नहीं होता।
शिला-पर्वतों से टकराती जलधाराएँ जब नीचे गिरती हैं, तो ऐसा प्रतीत होता है मानो प्रकृति स्वयं इस भूमि को प्रणाम कर रही हो। यह स्थान न केवल एक धार्मिक केंद्र है बल्कि प्रकृति की कलात्मकता का जीवंत प्रमाण भी है।
🌼 सिद्धि और कृपा का स्थल
विश्वास किया जाता है कि जो भी व्यक्ति श्रद्धा, भक्ति और सच्चे मन से यहाँ आता है—
उसकी प्रत्येक मनोकामना पूर्ण होती है।
वानर चूहा सिद्ध पीठऔर बागराजी पाठ वाले दादा,जोगनी माता की कृपा से यहाँ अनेक चमत्कार घटित हुए हैं।
कई लोग बताते हैं कि—
1.खोई हुई वस्तुएँ वापस मिल गईं
2.बिछड़े व्यक्ति घर लौट आए
3.कठिन समस्याएँ स्वयं हल हो गईं
संकटों से मुक्ति मिली….
ऐसा प्रतीत होता है मानो इस पवित्र भूमि पर अदृश्य रूप से महाशक्ति सदैव उपस्थित है।
🐝 मधुमक्खियों का रहस्यमय पहरा
पुराने लोग बताते हैं कि कुछ वर्षों पहले तक यहाँ बड़ी संख्या में मधुमक्खियाँ रहती थीं। माना जाता है कि यह मधुमक्खियाँ स्थान की रक्षक थीं।
कहावत है:
“जो यहाँ किसी प्रकार का अनिष्ट या द्वेष भाव रखकर आता है, उसे मधुमक्खियों का सामना अवश्य करना पड़ता है।”
यह विश्वास इस स्थान की पवित्रता और उसके दिव्य संरक्षकत्व को और भी प्रमाणित करता है।
🌄 प्रकृति और अध्यात्म का संगम
इस सिद्ध पीठ पर आकर ऐसा लगता है मानो मनुष्य नहीं, स्वयं प्रकृति प्रार्थना में लीन हो।
शिलाएँ, झरना, हरियाली और वातावरण—सब मिलकर एक दिव्य आभा रच देते हैं।
अचानक यह अनुभव होता है कि यहाँ केवल पत्थर, जल और वृक्ष नहीं—
बल्कि भक्ति, शक्ति और सिद्धि का अदृश्य संगम निवास करता है।
🙏 आज भी अटूट आस्था
आसपास के गाँवों में रहने वाले लोग आज भी इस सिद्ध स्थल को अपनी अटूट आस्था का केंद्र मानते हैं।
वे जीवन के छोटे-बड़े हर कार्य की शुरुआत इस स्थान पर माथा टेककर करते हैं।
उनकी मान्यता है कि—
“दादा जोगनी माता और सिद्ध बाबा की कृपा से घर में शांति, समृद्धि और सुख बना रहता है।”
✨ निष्कर्ष : एक जीवंत चमत्कार
बंदर–चूहा सिद्ध पीठ केवल एक धाम नहीं,
एक जीती-जागती आध्यात्मिक अनुभूति है।
यहाँ हर कदम पर इतिहास है, हर दिशा में विश्वास है और हर कण में ईश्वर की अनुभूति।
जो भी यहाँ आता है, वह हल्का, शांत और निर्मल होकर लौटता है—
मानो स्वयं ईश्वर ने उसके सिर पर हाथ फेर दिया हो।