पश्चिम एशिया में उभरती दरार: सऊदी अरब और यूएई के बीच रणनीतिक टकराव गहराया,

पश्चिम एशिया के दो प्रमुख शक्ति केंद्र सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) के बीच बढ़ता तनाव वैश्विक स्तर पर ध्यान आकर्षित कर रहा है। एक समय रणनीतिक साझेदार रहे ये दोनों देश अब संसाधनों, प्रभाव और भू-राजनीतिक नियंत्रण को लेकर आमने-सामने खड़े दिखाई दे रहे हैं। बीते एक दशक तक दोनों देशों ने क्षेत्रीय आंदोलनों को दबाने, तेल बाजार को नियंत्रित करने और संयुक्त रूप से पावर ब्रोकर की भूमिका निभाने में मजबूत तालमेल दिखाया था, लेकिन बदलती महत्वाकांक्षाओं ने इस रिश्ते में गहरी दरार पैदा कर दी है।यूरेशियन टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिका के करीबी सहयोगी सऊदी अरब और यूएई के बीच 2023 से 2026 के दौरान टकराव लगातार बढ़ा है। यमन और सूडान में शुरू हुआ प्रॉक्सी वॉर अब प्रत्यक्ष संघर्ष के मुहाने पर पहुंच चुका है। हाल ही में सऊदी अरब द्वारा यूएई समर्थित गुटों की आपूर्ति लाइन माने जाने वाले एक रणनीतिक बंदरगाह पर हवाई हमले के बाद यमन में यूएई की स्थिति कमजोर हुई, जिससे दोनों देशों के संबंध और तनावपूर्ण हो गए।इस टकराव की जड़ में लाल सागर, हॉर्न ऑफ अफ्रीका, होर्मुज जलडमरूमध्य और दक्षिणी अरब प्रायद्वीप जैसे रणनीतिक क्षेत्रों में संसाधनों और लॉजिस्टिक्स कॉरिडोर पर नियंत्रण की प्रतिस्पर्धा है। रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद दोनों देशों को यह एहसास हुआ कि केवल तेल ही शक्ति का स्रोत नहीं है, बल्कि बंदरगाहों, खनिज संसाधनों और सुरक्षित आपूर्ति मार्गों पर नियंत्रण भी उतना ही महत्वपूर्ण है।अफ्रीकी देश सूडान इस प्रतिस्पर्धा का एक और प्रमुख केंद्र बन गया है। सूडान में यूएई ने रैपिड सपोर्ट फोर्सेज (RSF) का समर्थन किया, जबकि सऊदी अरब ने सूडानी सशस्त्र बलों (SAF) का साथ दिया। सऊदी समर्थन से SAF को बढ़त मिलने के बाद यूएई के हितों को झटका लगा, जिससे दोनों देशों के बीच तनाव और बढ़ गया।

विशेषज्ञों के अनुसार, सऊदी अरब क्षेत्रीय स्थिरता के लिए केंद्रीकृत प्रभाव चाहता है, जबकि यूएई बिना औपचारिक स्वामित्व के रणनीतिक नियंत्रण की नीति अपनाता है। यही वैचारिक अंतर इस टकराव को और गहरा बना रहा है। यह दरार खाड़ी सहयोग की अवधारणा को कमजोर कर रही है और ईरान, तुर्की जैसी क्षेत्रीय शक्तियों के लिए नए अवसर पैदा कर रही है।हालांकि सऊदी-यूएई संबंध पूरी तरह समाप्त नहीं हुए हैं, लेकिन साझेदारी अब प्रतिस्पर्धा में बदल चुकी है। यह स्थिति पहले से अस्थिर पश्चिम एशिया में आर्थिक और राजनीतिक अनिश्चितता को और बढ़ा सकती है।

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