पाकिस्तान में 27वां संविधान संशोधन: सेना की शक्तियों और संघीय ढांचे पर बढ़ी बहस,

पाकिस्तान में प्रस्तावित 27वां संविधान संशोधन (27th Constitutional Amendment) इन दिनों गहन राजनीतिक और संवैधानिक बहस का विषय बना हुआ है। इस संशोधन के तहत न्यायपालिका के प्रबंधन और अनुशासन, संघीय और प्रांतीय सरकारों के बीच संसाधनों के वितरण, तथा सशस्त्र बलों के नियंत्रण से संबंधित 1973 के संविधान के अनुच्छेद 243 में बड़े बदलाव प्रस्तावित हैं।इन संशोधनों के जरिये सेना को मिलने वाली शक्तियों और उसके नियंत्रण क्षेत्र को पुनर्परिभाषित करने की कोशिशों ने राजनीतिक हलकों में नई हलचल मचा दी है। देश के भीतर और बाहर दोनों ही स्तरों पर इस बात की आशंका व्यक्त की जा रही है कि यह संशोधन पाकिस्तान की लोकतांत्रिक संरचना को कमजोर कर सकता है और सैन्य प्रतिष्ठान को और अधिक प्रभुत्वशाली बना देगा।पाकिस्तानी रक्षा विशेषज्ञ डॉ. आयशा सिद्दीक़ा ने द प्रिंस (The Print) में प्रकाशित अपने लेख में इस संशोधन को लेकर गंभीर चिंता जताई है। उनके अनुसार, वर्तमान सैन्य नेतृत्व — विशेष रूप से जनरल आसिम मुनीर — इस संशोधन के माध्यम से “सभी शक्तियों को अपने पास केंद्रीकृत करने” का प्रयास कर रहे हैं।आयशा सिद्दीक़ा का कहना है कि यह कदम न केवल संविधान की संघीय भावना के खिलाफ है, बल्कि यह सैन्य वर्चस्व को वैधानिक आधार प्रदान करने की दिशा में भी एक और कदम है। उन्होंने लिखा कि पाकिस्तान की सेना “राजनीतिक और आर्थिक रूप से देश की लगभग सभी संस्थाओं पर नियंत्रण चाहती है” और 27वां संशोधन उसी एजेंडे का हिस्सा प्रतीत होता है।

पश्तून तहरीक नेता मोहसिन दावर ने इस संशोधन को “पंजाब के अभिजात वर्ग द्वारा 18वें संशोधन को समाप्त करने का प्रयास” बताया है। उन्होंने कहा कि यह संशोधन पाकिस्तान की संघीय एकता के लिए खतरनाक साबित हो सकता है।गौरतलब है कि वर्ष 2010 में पारित 18वें संविधान संशोधन ने पाकिस्तान को एक अधिक संघीय ढांचा प्रदान किया था, जिसमें प्रांतों को अधिक वित्तीय और प्रशासनिक अधिकार दिए गए थे। उसी के बाद से सेना और संघीय नौकरशाही के कुछ वर्गों को यह संशोधन खटकता रहा है।पूर्व सेना प्रमुख जनरल कमर जावेद बाजवा ने भी 18वें संशोधन को “खतरनाक” बताते हुए इसकी तुलना शेख मुजीबुर्रहमान के 1966 के छह सूत्रीय कार्यक्रम से की थी, जो अंततः पाकिस्तान के विभाजन का आधार बना था।विश्लेषकों का मानना है कि पाकिस्तान की सेना लंबे समय से खुद को केवल सुरक्षा संस्थान नहीं, बल्कि “राज्य का असली नियंता” मानती रही है।साल 2007 के अंत में परवेज मुशर्रफ के बाद सेना प्रमुख बने जनरल परवेज कियानी भी तत्कालीन राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी को 18वें संशोधन को पारित करने से नहीं रोक पाए थे। अब, लगभग डेढ़ दशक बाद, सैन्य प्रतिष्ठान उसी परिवर्तन को वापस लेने की दिशा में सक्रिय प्रतीत हो रहा है।

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