नर्सिंग फैकल्टी भर्ती पर हाईकोर्ट की सख्ती, प्रक्रिया न्यायिक निर्णय के अधीन,

मध्यप्रदेश कर्मचारी चयन मंडल (ESB) द्वारा जारी नर्सिंग फैकल्टी भर्ती प्रक्रिया अब न्यायिक जांच के दायरे में आ गई है। वर्ष 2024 की राजपत्र (गजट) अधिसूचना के उल्लंघन के आरोपों को लेकर दायर याचिका पर मध्यप्रदेश हाईकोर्ट, जबलपुर ने लोक स्वास्थ्य एवं चिकित्सा शिक्षा विभाग को नोटिस जारी करते हुए जवाब तलब किया है। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि यह पूरी भर्ती प्रक्रिया याचिका के अंतिम निर्णय के अधीन रहेगी। इस आदेश को अनुभवी नर्सिंग ऑफिसरों के लिए बड़ी राहत के रूप में देखा जा रहा है।याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता अभिषेक पाण्डेय और अंशुल तिवारी ने अदालत में तर्क रखा कि वर्ष 2024 की गजट अधिसूचना के अनुसार एसोसिएट प्रोफेसर के सभी पद पदोन्नति के माध्यम से भरे जाने थे। इसके बावजूद चयन मंडल द्वारा 40 पदों को सीधी भर्ती के अंतर्गत विज्ञापित कर दिया गया, जो स्पष्ट रूप से अधिसूचना का उल्लंघन है। इसी तरह असिस्टेंट प्रोफेसर पदों के लिए निर्धारित 60 प्रतिशत पदोन्नति और 40 प्रतिशत सीधी भर्ती के प्रावधान को भी नजरअंदाज कर सभी पदों को सीधी भर्ती से भरने की प्रक्रिया शुरू कर दी गई।याचिका में यह भी उल्लेख किया गया कि पूर्व में सीबीआई जांच के बाद विभाग में फैकल्टी की भारी कमी उत्पन्न हो गई थी। उस समय शासन द्वारा इन्हीं अनुभवी नर्सिंग ऑफिसरों को अस्थायी प्रभार देकर वर्षों तक असिस्टेंट प्रोफेसर और एसोसिएट प्रोफेसर जैसे महत्वपूर्ण पदों पर कार्य कराया गया। इसके बावजूद न तो उन्हें नियमित पदोन्नति दी गई और न ही सेवाओं का स्थायीकरण किया गया। अब सीधी भर्ती के माध्यम से उनके वर्षों के अनुभव और अधिकारों को नजरअंदाज किया जा रहा है, जिससे उनके अवसर समाप्त हो रहे हैं।मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति विशाल धगत की एकलपीठ में हुई। अदालत ने प्रमुख सचिव, लोक स्वास्थ्य एवं चिकित्सा शिक्षा विभाग सहित सभी संबंधित विभागों और संस्थाओं को तीन सप्ताह के भीतर अपना जवाब प्रस्तुत करने के निर्देश दिए हैं। साथ ही अदालत ने यह भी स्पष्ट किया है कि नर्सिंग फैकल्टी की यह भर्ती प्रक्रिया न्यायालय के अंतिम निर्णय के बाद ही प्रभावी मानी जाएगी।

अधिवक्ताओं का कहना है कि हाईकोर्ट का यह आदेश प्रदेश के नर्सिंग समुदाय, विशेषकर अनुभवी नर्सिंग ऑफिसरों के अधिकारों की रक्षा की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। लंबे समय से लंबित पदोन्नति, नियमों के उल्लंघन और सीधी भर्ती को लेकर उठ रहे प्रश्न अब सीधे न्यायिक समीक्षा के दायरे में आ गए हैं। इससे न केवल भर्ती प्रक्रिया की पारदर्शिता सुनिश्चित होगी, बल्कि वर्षों से सेवा दे रहे नर्सिंग अधिकारियों को न्याय मिलने की उम्मीद भी मजबूत हुई है।

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