धनखड़ का इस्तीफा और नड्डा की तानाशाही – भाजपा की कलह और लोकतंत्र पर हमला उजागर,

धनखड़ का इस्तीफा: भाजपा की तानाशाही का नंगा नाच
21 जुलाई 2025 को उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने अचानक इस्तीफा दे दिया, स्वास्थ्य कारणों का हवाला देते हुए। लेकिन यह सिर्फ बहाना है। इसके पीछे “कहीं अधिक गंभीर राजनीतिक कारण” हैं – और क्यों न हों? धनखड़ का पूरा कार्यकाल अलोकतांत्रिक रहा, जहां उन्होंने राज्यसभा को भाजपा की कठपुतली बना दिया। और ऊपर से, भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा की हालिया हरकत ने संसद की गरिमा को तार-तार कर दिया। यह इस्तीफा नहीं, बल्कि भाजपा की आंतरिक कलह का खुलासा है। कल राज्यसभा में जो हुआ, वह भारतीय लोकतंत्र का सबसे शर्मनाक अध्याय है। भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा खड़े होकर बोले, “nothing will go on record, only what I say will go on record!” – यानी सदन में क्या रिकॉर्ड होगा, यह मैं तय करूंगा! यह क्या है? क्या नड्डा संसद के मालिक हैं? क्या वे सभापति धनखड़ को अपना चपरासी समझते हैं? धनखड़ चुपचाप बैठे देखते रहे, जैसे कोई कायर कठपुतली! यह संसदीय गरिमा का सबसे बड़ा अपमान है – पहली बार देश ने देखा कि एक पार्टी अध्यक्ष सभापति को खुलेआम निर्देश दे रहा है। नड्डा की यह अहंकारी हरकत भाजपा की तानाशाही मानसिकता को उजागर करती है। वे संसद को अपनी जेब में रखना चाहते हैं, जहां विपक्ष की आवाज को कुचल दिया जाए। देश नड्डा को कभी माफ नहीं करेगा – यह आदमी नहीं, बल्कि लोकतंत्र का दुश्मन है।
👉 नड्डा की यह गुंडागर्दी कोई नई बात नहीं। ऑपरेशन सिंदूर पर बहस के दौरान उन्होंने विपक्ष को दबाने की कोशिश की, लेकिन यह तो हद हो गई। क्या भाजपा सोचती है कि संसद उनकी पार्टी मीटिंग है? नड्डा को तुरंत इस्तीफा देना चाहिए – या क्या वे मोदी के इशारे पर ऐसा कर रहे हैं? यह घटना साबित करती है कि भाजपा संसद को अपनी इच्छा से चलाना चाहती है, जहां नियम, गरिमा और लोकतंत्र का कोई मतलब नहीं। शर्म आनी चाहिए नड्डा को।

धनखड़ का अलोकतांत्रिक कार्यकाल: पक्षपात की मिसाल
👉 जगदीप धनखड़ का पूरा कार्यकाल – 2022 से 2025 तक – अलोकतांत्रिक रहा। वे उपराष्ट्रपति नहीं, बल्कि भाजपा के एजेंट लगते थे! राज्यसभा में उन्होंने कांग्रेस और विपक्ष की आवाज को बार-बार कुचला – मणिपुर हिंसा, अदानी घोटाला जैसे मुद्दों पर चर्चा तक नहीं होने दी। विपक्ष ने उन्हें “रीढ़विहीन” कहा, और सही कहा! धनखड़ ने मोदी और भाजपा के आगे झुककर पद की गरिमा को मिट्टी में मिला दिया। दिसंबर 2024 में, राज्यसभा के इतिहास में पहली बार उनके खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाया गया – क्योंकि वे पक्षपाती थे, विपक्षी सदस्यों को निलंबित करते रहे, लेकिन भाजपा के असंसदीय आचरण पर चुप रहे। धनखड़ ने न्यायपालिका पर भी हमले किए – सुप्रीम कोर्ट के फैसलों को “असंवैधानिक” कहा, सीबीआई निदेशक की नियुक्ति पर सवाल उठाए, और भ्रष्टाचार के आरोपों वाले जजों पर टिप्पणी की। क्या यह सभापति का काम है? नहीं! वे भाजपा की राजनीति कर रहे थे। उनका कार्यकाल तूफानी रहा, लेकिन लोकतंत्र के लिए विनाशकारी – विपक्षी सांसदों को अपमानित किया, बहस को रोका, और सदन को भाजपा का अड्डा बना दिया।

👉 इस्तीफा स्वास्थ्य का बहाना है; असल में, नड्डा की घटना ने उनकी कायरता को उजागर कर दिया। धनखड़ ने संसद को अलोकतांत्रिक बना दिया – इतिहास उन्हें एक पक्षपाती कठपुतली के रूप में याद रखेगा

लोकतंत्र खतरे में: भाजपा की साजिश उजागर
धनखड़ का इस्तीफा और नड्डा की हरकत साबित करती है कि भाजपा लोकतंत्र को खत्म करना चाहती है। संसद अब बहस की जगह नहीं, बल्कि तानाशाही का मंच बन गई है। देश को जागना होगा – नड्डा जैसे लोग संसद को अपमानित कर रहे हैं, और धनखड़ जैसे कठपुतलियां चुप रहती हैं। यह समय है भाजपा की निंदा करने का, उनके अलोकतांत्रिक रवैये को बेनकाब करने का।

अगर हम चुप रहे, तो लोकतंत्र मर जाएगा। जागो भारत, लड़ो इस तानाशाही के खिलाफ एक जुट होकर लोकतंत्र को बचा लो।

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