दिवासी समाज के स्वामित्व अधिकारों की रक्षा हेतु एकजुट होने का आह्वान,

जैसा कि सर्वविदित है, विश्व में चार प्राचीन सभ्यताएँ विकसित हुईं — जिनमें से सिंधु घाटी की सभ्यता को वैज्ञानिकों ने सर्वश्रेष्ठ और सबसे समृद्ध सभ्यता के रूप में स्वीकार किया है। यह वही भूमि है जहाँ गोंडवाना लैंड के वंशज आज भी अपनी पहचान और अस्तित्व को बचाए रखने के लिए संघर्षरत हैं।आज देश के विकास और उद्योगों की रीढ़ जिन खनिज पदार्थों, धातुओं और प्राकृतिक संसाधनों पर टिकी हुई है, वे अधिकतर आदिवासी इलाकों की धरती के नीचे मौजूद हैं। लोहे, कोयले, सोने, बॉक्साइट, और हीरे जैसे मूल्यवान खनिज उन क्षेत्रों से निकाले जा रहे हैं जहाँ पीढ़ियों से आदिवासी समुदाय निवास कर रहे हैं। इन खनिजों से देश की अर्थव्यवस्था को मजबूती मिल रही है, किंतु जिन भूमियों से यह संपदा निकल रही है, उन असली मालिकों — हमारे आदिवासी भाइयों और बहनों — को न्यायसंगत अधिकार और मुआवजा आज भी नहीं मिल पा रहा है।


खनिज संपदा पर न्यायपूर्ण अधिकार की मांग

हाल के दिनों में मध्यप्रदेश के सिंगरौली जिले की 59 ग्राम पंचायतों में विशाल कोयला भंडार की खोज हुई है। किंतु, स्थानीय निवासियों को मात्र 10 से 20 लाख रुपये प्रति एकड़ के मुआवजे पर उनकी भूमि से विस्थापित किया जा रहा है।
वहीं, विशेषज्ञों के अनुसार, एक एकड़ भूमि में लगभग 70 करोड़ रुपये मूल्य का कोयला निकाला जा सकता है। यह आंकड़ा स्पष्ट रूप से दिखाता है कि वास्तविक लाभ सरकार और बड़ी कंपनियों को हो रहा है, जबकि मूल निवासी समाज को अपनी ही भूमि छोड़ने पर मजबूर किया जा रहा है।

ऐसी ही स्थिति झारखंड, रांची, बस्तर, राजस्थान सहित कई राज्यों में देखने को मिल रही है, जहाँ सोना, हीरा और अन्य खनिजों के बड़े भंडार मौजूद हैं। इन प्राकृतिक संपदाओं के उपयोग और स्वामित्व को लेकर एक समग्र नीति की आवश्यकता महसूस की जा रही है।


ACC — अबॉरिजिनल कोऑर्डिनेशन कमेटी की भूमिका

इन परिस्थितियों में, आदिवासी समाज के हितों की रक्षा के लिए ACC (Aboriginal Coordination Committee) के माध्यम से एक विशेष रणनीति और योजना बनाने की आवश्यकता है। समिति का उद्देश्य होगा —

  1. आदिवासी समाज के स्वामित्व अधिकारों की रक्षा करना,
  2. भूमि और प्राकृतिक संसाधनों पर न्यायपूर्ण मुआवजे का प्रावधान सुनिश्चित करना,
  3. तथा समाज को आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक रूप से सशक्त बनाना।

इस मुद्दे पर सभी संगठनों, सामाजिक प्रतिनिधियों और बुद्धिजीवियों के बीच आम सहमति और एकता बनाना अत्यंत आवश्यक है, ताकि देश के वास्तविक मालिकों — हमारे आदिवासी समाज — को उनका हक और सम्मान मिल सके।


जोहार!
यह समय है अपने अधिकारों, अपनी भूमि और अपनी पहचान को पुनः स्थापित करने का। आइए, एकजुट होकर अपने संसाधनों पर स्वामित्व सुनिश्चित करें और गोंडवाना लैंड की अस्मिता को पुनर्जीवित करें।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *