जनगणना प्रपत्र में आदिवासी धर्म हेतु पृथ्क धर्म कोलम/कोड की पुनः बहाली के संबंध में ज्ञापन,

भारत के स्वतंत्रता पूर्व काल में जनगणना प्रपत्रों में आदिवासी समुदायों के लिए अलग धर्म कॉलम/कोड की व्यवस्था थी, जिससे उनकी सांस्कृतिक एवं धार्मिक विशिष्टता का सम्मान होता था। परंतु स्वतंत्रता के उपरांत इस व्यवस्था को समाप्त कर दिया गया, जिससे आदिवासी समुदाय की धार्मिक पहचान लुप्त होती जा रही है। जबकि स्वतंत्रता के पूर्व विशिष्ट पहचान के साथ जनगणना प्रपत्र में अलग कॉलम/कोड दिया जाता था।ऐसे में उन्हें जनगणना में अन्य धर्मों के अंतर्गत जबरन शामित करना संविधान की भावना और मूलभूत अधिकारों का उल्लंघन है।

हम इस ज्ञापन के माध्यम से निम्न बिंदुओं की ओर सरकार का ध्यान आकर्षित करना चाहते है

  1. संविधान का अनुच्छेद 25 प्रत्येक नागरिक को धर्म की स्वतंत्रता का अधिकार प्रदान करता है। इसमें यह स्पष्ट है कि प्रत्येक व्यक्ति को अपनी आस्था और पूजा पद्धति का पालन करने की स्वतंत्रता है।

अनुच्छेद 29 भारत के नागरिकों को अपनी विशिष्ट सस्कृति लिपि, या भाषा को संरक्षित करने का अधिकार देता है। आदिवासी समुदाय की धार्मिक परंपराए इसी अधिकार के अंतर्गत आती हैं।

अनुच्छेद 244 और पांचवी एवं छठी अनुसूची आडिवत्ती क्षेत्रों की विशेष संरचना और खशासन की बात करते हैं, को उनकी सांस्कृतिक पहचान को मान्यता प्रदान करते हैं।

4 संयुक्त राष्ट्र की genous Peoples Declaration (2007) के अनुच्छेद 12 सूर्य 13 के अनुसार आदिवासी लोगों को अपने धर्म, परण्य और पहचान को बनाए स्याने और उसे सान्यता दिलवाने का अधिकार है।

में अतः हम भारत सरकार से विम निवेदन करते हैं कि आगामी जनगणना दृश्वस रिलीजन (Tribal Religion) के नाम से एक पूपक धर्म कॉलम कोष का प्रावधान सुनिक्षित किया जाए जिससे कि आदिवासी समुदाय की धार्मिक आस्मता को संवेधानिक मान्यता मिल सका और उसकी पहात सुरक्षित रह सके।

हमे पूर्ण विश्वास है कि सरकार हमारे इस सवैधानिक सास्कृतिक एवं नैतिक जगह

को स्वीकार कर सकारात्मक निर्णय लेगी।

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