प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में भारत आज विकास के ऐसे मार्ग पर आगे बढ़ रहा है, जहाँ आर्थिक प्रगति के साथ-साथ पर्यावरण संरक्षण, सार्वजनिक स्वास्थ्य और सांस्कृतिक मूल्यों को समान महत्व दिया जा रहा है। इसी समग्र दृष्टिकोण के अंतर्गत भारतीय कृषि को भी एक नए और सतत युग की ओर ले जाने का प्रयास किया जा रहा है। कृषि सदियों से भारतीय सभ्यता की रीढ़ रही है, किंतु आधुनिक समय में रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों पर अत्यधिक निर्भरता ने खेती की लागत बढ़ाने के साथ-साथ मिट्टी की उर्वरता, जलधारण क्षमता और दीर्घकालिक स्थिरता को गंभीर रूप से प्रभावित किया है।प्रधानमंत्री मोदी जी ने बार-बार यह स्पष्ट किया है कि भारत की अनेक समस्याओं का समाधान हमारी पारंपरिक ज्ञान परंपरा में निहित है। इसी सोच के साथ प्राकृतिक खेती को राष्ट्रीय स्तर पर प्रोत्साहित किया जा रहा है। प्राकृतिक खेती न केवल कृषि उत्पादन की पद्धति है, बल्कि स्वास्थ्य, पर्यावरण और आत्मनिर्भरता से जुड़ा एक समग्र विचार है। इसका उद्देश्य रसायन-मुक्त, विषरहित भोजन के माध्यम से नागरिकों के स्वास्थ्य की रक्षा करना और किसानों को बाहरी आदानों पर निर्भरता से मुक्त करना है।भारत की पारंपरिक कृषि व्यवस्था सह-अस्तित्व और संतुलन पर आधारित रही है, जिसमें गौमाता की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही है। गौ केवल आस्था का प्रतीक नहीं, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था, कृषि उत्पादकता और पोषण सुरक्षा का आधार रही हैं। गोबर और गोमूत्र से तैयार जीवामृत, बीजामृत और पंचगव्य जैसे प्राकृतिक आदान मिट्टी के सूक्ष्म जीवों को सक्रिय करते हैं, जिससे भूमि पुनः जीवंत होती है और दीर्घकाल में अधिक उपज देने योग्य बनती है।प्रधानमंत्री मोदी जी की दृष्टि में प्राकृतिक खेती केवल तकनीक नहीं, बल्कि जीवन जीने की भारतीय पद्धति है। यह खेती की लागत घटाकर किसानों की आय बढ़ाने का सशक्त माध्यम है। पलवार (मल्चिंग) जैसी तकनीकों से मिट्टी की नमी बनी रहती है, जल संरक्षण होता है और जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभावों से फसलों की रक्षा होती है। इससे ‘शून्य बजट प्राकृतिक खेती’ का लक्ष्य व्यवहारिक रूप से संभव होता है।प्राकृतिक खेती को जन-आंदोलन बनाने में केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री श्री अमित शाह जी के ‘सहकारिता से समृद्धि’ विजन की भी महत्वपूर्ण भूमिका है। किसान उत्पादक संगठनों (FPOs) के माध्यम से किसानों को संगठित किया जा रहा है, जिससे उन्हें प्राकृतिक आदान, तकनीकी मार्गदर्शन और विषमुक्त उत्पादों के लिए उचित बाजार उपलब्ध हो सके।

प्राकृतिक खेती का प्रभाव केवल खेत तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका सीधा संबंध मानव स्वास्थ्य से है। आज बढ़ती जीवनशैली जनित बीमारियों के पीछे रासायनिक अवशेषों वाला भोजन एक बड़ा कारण है। प्राकृतिक खेती से प्राप्त शुद्ध अन्न रोग-प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाता है और दीर्घकालिक स्वास्थ्य को सुदृढ़ करता है। योग और आयुष को वैश्विक पहचान दिलाने की प्रधानमंत्री मोदी जी की पहल भी इसी समग्र स्वास्थ्य दृष्टि का हिस्सा है।प्रधानमंत्री का मंत्र—‘एक एकड़, एक मौसम’—किसानों को बिना जोखिम प्राकृतिक खेती अपनाने की प्रेरणा देता है। केंद्र सरकार के राष्ट्रीय प्राकृतिक खेती मिशन के अंतर्गत प्रशिक्षण, तकनीकी सहयोग और बाजार से जोड़ने की मजबूत व्यवस्था की गई है। महिला किसान भी इस परिवर्तन में अग्रणी भूमिका निभा रही हैं।गौ-आधारित प्राकृतिक खेती केवल कृषि सुधार नहीं, बल्कि भारतीय जीवनदृष्टि का पुनर्जागरण है। यह मिट्टी, किसान और उपभोक्ता—तीनों के स्वास्थ्य की रक्षा करते हुए विकसित, आत्मनिर्भर और स्वस्थ भारत के लक्ष्य को साकार करने का सशक्त माध्यम है।