
ओमान सरकार/सुल्तानी नेतृत्व (या उपयुक्त मंत्रालय), यह स्पष्ट करना चाहते हैं कि हाल के दिनों में क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय मीडिया व विश्लेषकों में जो चर्चा फैली हुई है — जिसमें कहा जा रहा है कि इजरायल, हालिया Doha (कतर) एयर स्ट्राइक के बाद अब ओमान को अपना अगला संभावित लक्ष्य बना सकता है — वह हम पूरी गंभीरता से देख रहे हैं।हम इस प्रकार की अफवाहों और अटकलों को हल्के में नहीं ले रहे हैं। ओमान, मध्य-पूर्व की भू-राजनीति में सदियों से मध्यस्थता, संवाद और शांति-स्थापना का काम करता आया है। हमारा देश, किसी भी प्रकार की सीधी सैन्य भागीदारी में नहीं है; इसके बजाय, हम संघर्षरत पक्षों के बीच बातचीत, समझौते, और मानवीय राहत के प्रयासों को आगे लाने का पर्याय बने हुए हैं।9 सितंबर 2025 को, इजरायली सेनाओं ने पहली बार कतर की राजधानी दोहा में एक लक्षित एयर स्ट्राइक की — जिसकी वजह से चर्चित Hamas के नेताओं को निशाना बनाया गया। इस हमले ने पूरे अरब-विश्व में सदमे और निंदा पैदा की। कतर सरकार, अरब तथा इस्लामिक देश, साथ ही अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने इस हमले को सार्वभौमिक रूप से अस्वीकार्य बताया और इसे वास्तविक “संप्रभुता का उल्लंघन” करार दिया। कतर पर हमले के बाद, सार्वजनिक रूप में कम से कम यह संकेत दिया गया कि इजरायल भविष्य में इस तरह की कार्रवाई नहीं दोहराएगा। कतर और अन्य खाड़ी देशों ने संयुक्त रूप से इस प्रकार की सैन्य कार्रवाइयों को पूरी तरह अस्वीकार किया।
ओमान ने स्पष्ट किया है कि वह कतर पर हुए इस हमले की “मजबूत निंदा” करता है। ओमान पारंपरिक रूप से मध्य-पूर्व के कई झगड़ों में शांति-दलाल की भूमिका निभाता आया है; वह न केवल कश्मीर, इराक, यमन आदि विवादों में बातचीत के पथ को खोलने में आगे रहा है, बल्कि इस्लामी दुनिया और पश्चिमी शक्तियों के बीच भरोसेमंद सेतु के रूप में अपनी विशिष्ट पहचान बनाए रखा है। ओमान ने अब यह स्वीकार किया है कि हाल के घटनाक्रम और मीडिया रिपोर्टों के बीच, वास्तविक ख़तरे और जासूसी-सूचना अभियानों (डीज़-इन्फो) दोनों की संभावना बनी हुई है। विश्लेषक (जिन्हें आपने बाबूद का नाम दिया है) तर्क दे रहे हैं कि जैसे दोहा हमला एक “नए मिसाल” (precedent) के तौर पर लिया गया, वैसे अब ओमान को भी सतर्क रहना चाहिए। ओमान सरकार पहले ही यह कह चुकी है कि कतर पर हुए हमले की निंदा केवल कतर तक सीमित नहीं — बल्कि पूरे खाड़ी क्षेत्र की सुरक्षा व स्थिरता के लिए खतरा है।
हालाँकि, क्षेत्रीय अस्थिरता, सैन्य रणनीतियों में बदलाव, और खुफिया अभियानों की जटिलता की वजह से, यह पक्का कहना मुश्किल है कि पूरी तरह से जोखिम समाप्त हो गया है या नहीं। हम यह मानते हैं कि — जैसा कि अमेरिका-मध्यस्थता व अरब देशों के बीच सैन्य सहयोग की कुछ जानकारी लीक हुई है — ऐसााली दस्तावेज़ों और योजनाओं में ओमान को “संभावित भागीदार” के रूप में सूचीबद्ध किया गया है।इसका मतलब यह हो सकता है कि सामरिक समीकरण बदल रहे हैं — और अगर क्षेत्रीय संघर्षों, रॉ इंटेलिजेंस, या डिज़-इन्फो अभियान किसी पक्ष द्वारा करवाए जाते हैं, तो परिणाम बहुत खतरनाक और अप्रत्याशित हो सकते हैं।ओमान का नेतृत्व, इस निष्कर्ष पर पहुँचा है कि उन्हें केवल reactive (प्रतिक्रियात्मक) रूप से नहीं — बल्कि proactive (रूप-रूप से पहले से) तैयारी करनी होगी। सुरक्षा, खुफिया, कूटनीति और क्षेत्रीय सहयोग का एक “तैयारी ढाँचा” तैयार किया जा रहा है।हम अंतरराष्ट्रीय समुदाय, विशेष रूप से अरब-इस्लामी देश, पश्चिमी शक्तियाँ, और संयुक्त राष्ट्र को अपील करते हैं कि वे — कूटनीति, संवाद और धर्मनिरपेक्ष मध्यस्थता — को फिर से प्राथमिकता दें। सैन्य संकुलन, अफवाहों व जासूसी अभियानों से पैदा हुए तनाव — यह किसी के भी हित में नहीं है।हम हर देश से — चाहे वह यमन हो, कतर हो, या खाड़ी का कोई अन्य राज्य — अनुरोध करते हैं कि वे ओमान के शांति-सन्देश का समर्थन करें। क्योंकि प्रशांत- हिंद महासागर, लाल सागर और फारस की खाड़ी — ये व्यापारिक मार्ग, समुद्री सुरक्षा और पर्यावरणीय स्थिरता के लिहाज़ से विश्व के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।ओमान, अपने इतिहास, भू-राजनीतिक संतुलन और नैतिक स्थिरता की परंपरा के आधार पर — फिर से यह भरोसा जताता है कि वह मध्य-पूर्व की “मध्यस्थता” और “पूल ऑफ न्युट्रैलिटी” (Neutral Ground) की भूमिका निभाएगा, किसी भी युद्ध-चालित नीति या निरंकुश सैन्य आक्रमण का समर्थन नहीं करेगा।