इजरायल ने ऑपरेशन राइजिंग लायन के तहत ईरान के परमाणु ठिकानों को तबाह किया,

मध्य पूर्व एक बार फिर वैश्विक चिंता का केंद्र बन गया है। 12 जून की रात इजरायल ने ‘ऑपरेशन राइजिंग लायन’ के तहत ईरान के परमाणु ठिकानों पर एक सर्जिकल स्ट्राइक की। इस सैन्य कार्रवाई में इजरायल ने ईरान के कई रणनीतिक परमाणु केंद्रों को निशाना बनाया और 9 शीर्ष परमाणु वैज्ञानिकों को मार गिराया। इजरायल ने स्पष्ट किया है कि उसका उद्देश्य ईरान को दुनिया का दसवां परमाणु संपन्न देश बनने से रोकना है।इस कार्रवाई के बाद क्षेत्र में हालात बेहद तनावपूर्ण हो गए हैं। इजरायल के प्रधानमंत्री ने बयान जारी कर कहा कि “हम विश्व समुदाय की सुरक्षा के लिए प्रतिबद्ध हैं और ईरान को परमाणु हथियार हासिल नहीं करने देंगे, चाहे इसके लिए हमें कोई भी कीमत क्यों न चुकानी पड़े।” इजरायली खुफिया एजेंसी मोसाद की मदद से अंजाम दिए गए इस ऑपरेशन की योजना लंबे समय से बनाई जा रही थी।वहीं, ईरान ने इस हमले को अपनी संप्रभुता पर हमला बताया है और चेतावनी दी है कि इसका बदला लिया जाएगा। ईरान के विदेश मंत्रालय ने अंतरराष्ट्रीय मंचों पर इस मुद्दे को उठाने की तैयारी शुरू कर दी है। रिवोल्यूशनरी गार्ड कोर (IRGC), जो ईरान की सत्ता की वास्तविक धुरी मानी जाती है, ने दावा किया है कि इस हमले के बावजूद उनका परमाणु कार्यक्रम नहीं रुकेगा।ईरान की राजनीति को समझना इस पूरे घटनाक्रम को जानने के लिए बेहद जरूरी है। ईरान में सत्ता लोकतांत्रिक रूप से चुनी गई सरकार के बजाय कट्टरपंथी धार्मिक नेतृत्व और IRGC के हाथों में है। यह सत्ता प्रणाली चुनावों से नहीं बल्कि एक क्रांतिकारी शासन व्यवस्था से उपजी है, जहां आम जनता की राजनीतिक भूमिका सीमित है। इसी कारण, दुनिया को डर है कि अगर ऐसा शासन परमाणु हथियारों का स्वामी बन गया, तो इसका असर केवल क्षेत्रीय नहीं बल्कि वैश्विक होगा।

संयुक्त राष्ट्र और प्रमुख वैश्विक शक्तियों ने संयम बरतने की अपील की है। अमेरिका, रूस, चीन, फ्रांस और भारत समेत कई देशों ने इस घटनाक्रम पर गंभीर चिंता जताई है और संयम बरतने की अपील की है। अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IAEA) ने ईरान की परमाणु सुविधाओं के नुकसान की जांच के लिए स्वतंत्र जांच दल भेजने की घोषणा की है।यह स्पष्ट है कि 'ऑपरेशन राइजिंग लायन' के बाद मध्य पूर्व में शांति की संभावनाएं और कम हो गई हैं। यह संघर्ष केवल दो देशों के बीच की लड़ाई नहीं है, बल्कि यह वैश्विक परमाणु अप्रसार संधियों, क्षेत्रीय स्थिरता और अंतरराष्ट्रीय कानूनों के सम्मान से भी जुड़ा हुआ मुद्दा बन गया है।

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