अमेरिका की नई नेशनल सिक्योरिटी स्ट्रैटजी से वैश्विक राजनीति में हलचल, ‘C-5’ संगठन का प्रस्ताव बना चर्चा का केंद्र,

अमेरिका की नई राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति (National Security Strategy – NSS) के सार्वजनिक होने के बाद वैश्विक राजनीति में नई हलचल शुरू हो गई है। दस्तावेज़ में जहाँ चीन से मुकाबला, यूरोप में सुरक्षा जिम्मेदारी से पीछे हटने जैसी बातें प्रमुखता से दर्ज हैं, वहीं कई महत्वपूर्ण बिंदु ऐसे हैं जिन्हें सार्वजनिक नहीं किया गया है या बहुत सीमित रूप में दुनिया के सामने रखा गया है। इन गुप्त हिस्सों में ट्रंप प्रशासन द्वारा तैयार की गई कुछ बड़ी रणनीतिक नीतियाँ शामिल हैं, जिनके संकेत मिलते ही दुनिया के रक्षा विश्लेषकों का ध्यान इस ओर मुड़ गया है। खासकर एक नए वैश्विक मंच ‘C-5’ के उल्लेख ने भू-राजनीतिक हलकों को चौंका दिया है।प्राप्त जानकारी के अनुसार, NSS के सार्वजनिक किए गए हिस्से में अमेरिका द्वारा यूरोप की सुरक्षा जिम्मेदारियों में कटौती का संकेत है। वहीं जो बातें सार्वजनिक नहीं की गई हैं, उनमें “Make Europe Great Again” यानी “यूरोप को फिर महान बनाने” का विचार शामिल है। लीक दस्तावेज़ यह दर्शाते हैं कि वाशिंगटन यूरोप के भविष्य पर वैचारिक प्रभाव बढ़ाने के लिए नई रणनीति बना रहा है। ड्राफ़्ट में यह तक कहा गया है कि यूरोप “आव्रजन नीतियों और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर सेंसरशिप” की वजह से “सभ्यतागत संकट” का सामना कर रहा है। इसलिए अमेरिका को ऑस्ट्रिया, हंगरी, इटली और पोलैंड जैसे देशों के साथ वैचारिक और कूटनीतिक संबंध और मज़बूत करने चाहिए, ताकि अमेरिका यूरोप के भीतर अपने प्रभाव को पुनर्स्थापित कर सके।ड्राफ्ट NSS का सबसे दिलचस्प और चर्चित हिस्सा है नए अंतरराष्ट्रीय समूह ‘C-5’ के गठन का प्रस्ताव, जो पांच बड़ी जनसंख्या वाले शक्तिशाली देशों — अमेरिका, चीन, रूस, भारत और जापान के लिए एक सामूहिक मंच होगा। यह समूह G-7 या G-20 की तरह आर्थिक मानदंडों या लोकतांत्रिक सिद्धांतों पर आधारित नहीं होगा, बल्कि आबादी, रणनीतिक क्षमता और वैश्विक प्रभाव के आधार पर गठित किया जाएगा। इसका उद्देश्य प्रमुख भू-राजनीतिक मुद्दों पर समन्वय स्थापित करना और वैश्विक शक्ति संतुलन की दिशा तय करना बताया गया है।लीक दस्तावेजों में यह भी दर्ज है कि C-5 की पहली प्रस्तावित बैठक का मुख्य एजेंडा मध्य पूर्व में शांति स्थापित करना होगा, जिसमें इज़रायल और सऊदी अरब के बीच संबंधों को सामान्य करने की दिशा में ठोस कदम शामिल होंगे। रणनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, यदि C-5 का गठन होता है, तो यह वैश्विक कूटनीति के परिदृश्य को पूरी तरह बदल देगा।

वर्तमान में विश्व राजनीति में अमेरिकी नेतृत्व वाला G-7 एक अत्यंत प्रभावशाली समूह माना जाता है। इसमें अमेरिका, कनाडा, फ्रांस, जर्मनी, इटली, जापान और यूनाइटेड किंगडम शामिल हैं। यह लोकतांत्रिक देशों का समूह है जो वैश्विक अर्थव्यवस्था की नीतियां बनाने और विभिन्न भू-राजनीतिक मुद्दों का समाधान खोजने का दावा करता है। लेकिन रूस के हटने, G-20 और BRICS के विस्तार जैसे वैश्विक बदलावों के बाद अब G-7 की प्रासंगिकता पर लगातार प्रश्न उठ रहे हैं।कई विशेषज्ञों का मानना है कि यदि C-5 जैसा समूह अस्तित्व में आता है, तो यह G-7 की वैश्विक भूमिका को कमजोर कर सकता है। क्योंकि C-5 में दुनिया की सबसे बड़ी जनसंख्या और सैन्य शक्ति वाले देश शामिल होंगे, जो वैश्विक निर्णयों पर अत्यधिक प्रभाव रखते हैं। इसके साथ ही अमेरिका और चीन जैसे प्रतिद्वंद्वी देशों का एक ही मंच पर आना अंतरराष्ट्रीय राजनीति के लिए एक नया संतुलन तैयार कर सकता है।

ट्रंप प्रशासन की इस रणनीति का उद्देश्य न केवल चीन के बढ़ते प्रभाव को संतुलित करना है, बल्कि रूस, भारत और जापान के साथ रणनीतिक समीकरणों को नई दिशा देना भी माना जा रहा है। यह प्रस्ताव विश्व व्यवस्था को बहुध्रुवीय बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।दूसरी ओर, यूरोप से संबंधित NSS के गुप्त हिस्सों ने भी कई सवाल खड़े कर दिए हैं। यूरोप को “सभ्यतागत संकट” में बताया जाना और अमेरिका का अपने पारंपरिक यूरोपीय सहयोगियों के बजाय हंगरी, पोलैंड जैसे देशों के साथ निकटता बढ़ाने का सुझाव, वैश्विक राजनीति में नए ध्रुवीकरण की ओर संकेत करता है। विश्लेषकों का कहना है कि आने वाले समय में यह नीति यूरोपीय संघ के भीतर राजनीतिक विभाजन को और बढ़ा सकती है।इसके साथ ही NSS में एशिया, मध्य पूर्व और इंडो-पैसिफिक क्षेत्र को लेकर कई रणनीतियों को कम महत्व दिए जाने की बात भी सामने आई है, जो यह संकेत देती है कि आने वाले वर्षों में अमेरिका का ध्यान यूरोपीय वैचारिक नेतृत्व और C-5 जैसे नए मंचों की ओर अधिक केंद्रित हो सकता है।अमेरिका की इस नई रणनीति ने न केवल वैश्विक शक्ति संतुलन पर नए प्रश्न खड़े किए हैं, बल्कि यह भी स्पष्ट कर दिया है कि आने वाले समय में विश्व राजनीति बड़े बदलावों के दौर से गुजरेगी। यदि C-5 का गठन होता है, तो यह समूह 21वीं सदी के वैश्विक कूटनीति और रणनीति को पूरी तरह नए स्वरूप में ढाल सकता है।

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